Homeउत्तराखंडविशेष दृष्टिकोण: राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह बोले - कठिनाई को नहीं,...

विशेष दृष्टिकोण: राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह बोले – कठिनाई को नहीं, बच्चे की क्षमता को बनाएं उसकी असली पहचान

विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को दया की नहीं, बल्कि सम्मान, अधिकार और अवसरों की ज़रूरत होती है। समाज में जब तक हम किसी बच्चे की किसी शारीरिक, मानसिक या सीखने की कठिनाई को उसकी कमजोरी या स्थायी पहचान मानते रहेंगे, तब तक हम एक सच्चे समावेशी समाज का निर्माण नहीं कर सकते। बच्चे की चुनौती को उसकी पहचान बनाने के बजाय उसकी असीम क्षमताओं को पहचानना और उन्हें सही दिशा देना ही असली संवेदनशीलता है। हाल ही में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून के झाझरा स्थित आईटीआईटीआई दून संस्कृति स्कूल में आयोजित एक गरिमामय कार्यक्रम के दौरान यह बात प्रमुखता से सामने आई।

मौका था “विशिष्ट अधिगम अक्षमता यानी डिस्लेक्सिया और ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के मैपिंग अभियान” के शुभारंभ का। इस विशेष अभियान का उद्घाटन राज्य के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह द्वारा किया गया। इस अवसर पर उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि हर बच्चे के भीतर एक विशेष प्रतिभा छुपी होती है, बस ज़रूरत है उसे सही समय पर पहचानने, समझने और उसे निखारने के अवसर प्रदान करने की।

क्या है डिस्लेक्सिया और ऑटिज्म? शुरुआती पहचान क्यों है सबसे ज़रूरी
जब हम बच्चों के सर्वांगीण विकास की बात करते हैं, तो हमें समझना होगा कि हर बच्चा एक ही गति से नहीं सीखता। डिस्लेक्सिया एक ऐसी स्थिति है जिसे विशिष्ट अधिगम अक्षमता कहा जाता है। इसमें बच्चे को पढ़ने, लिखने, शब्दों को पहचानने या स्पेलिंग याद रखने में सामान्य से अधिक समय और कठिनाई होती है। इसका मतलब यह कतई नहीं है कि बच्चा मंदबुद्धि है या उसका मानसिक स्तर कम है। इतिहास गवाह है कि दुनिया के कई महान वैज्ञानिक, कलाकार और विचारक डिस्लेक्सिया से प्रभावित रहे हैं।

दूसरी ओर, ऑटिज्म एक न्यूरोलॉजिकल यानी तंत्रिका तंत्र से जुड़ी स्थिति है, जो किसी व्यक्ति के सामाजिक व्यवहार, बातचीत करने के तरीके और दुनिया को समझने के नजरिए को प्रभावित करती है। ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों को अपनी बात व्यक्त करने, नए लोगों से घुलने-मिलने या अपनी भावनाओं को साझा करने में थोड़ी झिझक या समस्या हो सकती है।

अक्सर जानकारी के अभाव में माता-पिता और शिक्षक ऐसे बच्चों को आलसी, लापरवाह या पढ़ाई में कमजोर मानकर अनदेखा कर देते हैं या उन्हें डांटते हैं। यही कारण है कि ‘मैपिंग अभियान’ अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है। मैपिंग का अर्थ है कि प्रदेश के प्रत्येक बच्चे की शुरुआती उम्र में ही वैज्ञानिक और व्यावहारिक तरीकों से पहचान की जाए। यदि किसी बच्चे में डिस्लेक्सिया या ऑटिज्म के लक्षण दिखते हैं, तो उसे सही समय पर चिन्हित कर उचित परामर्श, विशेषज्ञ सहायता और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराए जा सकें।

21वीं सदी की आधुनिक तकनीक और विशेष सहयोग तंत्र
आज का दौर 21वीं सदी का दौर है, जिसे तकनीक का युग कहा जाता है। आधुनिक तकनीक ने दिव्यांग और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए नए अवसरों के द्वार खोल दिए हैं। आज ऐसे कई सॉफ्टवेयर, मोबाइल ऐप्स, ऑडियो-विजुअल टूल्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित उपकरण मौजूद हैं जो डिस्लेक्सिया और ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों के सीखने के अनुभव को बेहद आसान और मनोरंजक बना सकते हैं।

तकनीक की मदद से पढ़ाई को विजुअल और इंटरैक्टिव बनाकर बच्चे की समझ को बढ़ाया जा सकता है। लेकिन केवल तकनीक ही काफी नहीं है। किसी भी विशेष आवश्यकता वाले बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए एक मजबूत और त्रिकोणीय सहयोग तंत्र का होना अनिवार्य है। इस तंत्र में चार मुख्य स्तंभ शामिल हैं:
परिवार
विद्यालय
चिकित्सा व बाल विशेषज्ञ
शासन और प्रशासन
जब ये चारों स्तंभ एक साथ मिलकर, सही तालमेल के साथ काम करते हैं, तभी किसी बच्चे के जीवन में वास्तविक और सकारात्मक बदलाव आता है। परिवार बच्चे को भावनात्मक सुरक्षा देता है, विद्यालय उसे सीखने का माहौल देता है, विशेषज्ञ उसे सही थेरेपी और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, और प्रशासन आवश्यक नीतियां व ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध कराता है।

पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों तक सुविधाओं का विस्तार एक बड़ी चुनौती
उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से विषम और पर्वतीय राज्य में विशेष स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की पहुंच एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय है। मैदानी इलाकों में तो डॉक्टर, स्पेशल एजुकेटर और थेरेपी सेंटर आसानी से मिल जाते हैं, लेकिन दूरस्थ पर्वतीय गांवों में रहने वाले बच्चों तक ये सेवाएं पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है।

पहाड़ी क्षेत्रों में जागरूकता की कमी और संसाधनों के अभाव के कारण अक्सर विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पहचान समय पर नहीं हो पाती। इस अभियान का एक प्रमुख लक्ष्य यह भी होना चाहिए कि मैपिंग और विशेषज्ञों की सेवाएं केवल शहरों तक सीमित न रहें, बल्कि मोबाइल वैन, डिजिटल माध्यमों और ब्लॉक स्तर पर शिविर लगाकर राज्य के अंतिम छोर पर खड़े हर बच्चे तक पहुंचाई जाएं।

शिक्षा विभाग की पहल: 200 विशेष शिक्षकों की नियुक्ति
समावेशी शिक्षा को धरातल पर उतारने के लिए केवल योजनाओं का ऐलान करना काफी नहीं होता, बल्कि जमीनी स्तर पर दक्ष जनशक्ति की आवश्यकता होती है। इसी दिशा में एक बड़ा और सराहनीय कदम उठाते हुए उत्तराखंड के शिक्षा मंत्री डॉ. धन सिंह रावत ने कार्यक्रम में जानकारी दी कि प्रदेश के सरकारी विद्यालयों में दिव्यांग और विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की पढ़ाई और देखरेख के लिए 200 विशेष शिक्षकों (स्पेशल एजुकेटर्स) की नियुक्ति की गई है।

यह निर्णय राज्य में समावेशी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। ये प्रशिक्षित शिक्षक विद्यालयों में उन बच्चों की पहचान कर सकेंगे जिन्हें सीखने में कठिनाई आ रही है और उन्हें सामान्य बच्चों के साथ सहजता से पढ़ने-लिखने में मदद करेंगे। जब सामान्य और विशेष आवश्यकता वाले बच्चे एक ही कक्षा में एक साथ पढ़ते हैं, तो इससे समाज में संवेदनशीलता और स्वीकार्यता का भाव भी बढ़ता है।

सामाजिक प्रतिबद्धता और निस्वार्थ सेवा का उदाहरण
कार्यक्रम के दौरान समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में लंबे समय से योगदान दे रहे पूर्व सांसद और डिस्लेक्सिया सोसायटी उत्तराखंड के अध्यक्ष श्री तरुण विजय के प्रयासों की विशेष रूप से सराहना की गई। वह पिछले लगभग 25 वर्षों से देश के हिमालयी और उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों के जनजातीय बच्चों के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मानजनक अवसर उपलब्ध कराने के कार्य में निरंतर समर्पित रहे हैं।

विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए समर्पित विद्यालयों की स्थापना करना केवल एक भौतिक निर्माण कार्य नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र निर्माण और मानवीय संवेदना से जुड़ा एक अत्यंत पवित्र कार्य है। ऐसे प्रयास समाज के अन्य सक्षम लोगों और गैर-सरकारी संगठनों को भी आगे आने और अपना योगदान देने की प्रेरणा देते हैं। जब तक समाज का हर वर्ग अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक सरकार के प्रयास पूरी तरह सफल नहीं हो सकते।

विशेषज्ञों की राय और समग्र पुनर्वास रणनीति
राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (एनआईईपीवीडी) के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. सुरेंद्र धालवाल ने कार्यक्रम के दौरान विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के शिक्षण, पहचान और मनोवैज्ञानिक सहयोग पर अपने गहन विचार व्यक्त किए। उन्होंने बताया कि हर बच्चे का सीखने का तरीका अलग होता है। कुछ बच्चे देखकर बेहतर सीखते हैं, कुछ सुनकर और कुछ गतिविधियों के माध्यम से।
पुनर्वास रणनीति के मुख्य पहलू निम्नलिखित हैं:
सही समय पर वैज्ञानिक मैपिंग और पहचान
व्यक्तिगत शिक्षण योजना तैयार करना
माता-पिता और शिक्षकों को नियमित प्रशिक्षण देना
बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य और आत्मविश्वास को बनाए रखना
व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना

कार्यक्रम के अंत में शिवानी कोटनाला द्वारा सभी अतिथियों, विशेषज्ञों, शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों का आभार व्यक्त किया गया। इस अवसर पर मौजूद विभिन्न विद्यालयों के अध्यापकों और छात्रों के उत्साह से यह स्पष्ट था कि यह अभियान केवल एक औपचारिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज की सोच में एक बड़ा बदलाव लाने का शंखनाद है।

समावेशी और संवेदनशील उत्तराखंड का निर्माण
उत्तराखंड की पावन भूमि से शुरू हुआ यह मैपिंग अभियान एक नए युग की शुरुआत है। यदि हम अपने बच्चों की शारीरिक या मानसिक सीमाओं को दरकिनार कर उनकी क्षमताओं, प्रतिभा और रचनात्मकता को पहचानें, तो वे समाज के लिए बोझ नहीं, बल्कि देश का अमूल्य गौरव बन सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हर नागरिक, हर शिक्षक और हर अभिभावक अपनी सोच में संवेदनशीलता और स्वीकार्यता लाए। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को सहानुभूति या दया की भावना से देखने के बजाय उन्हें बराबरी का दर्जा, बेहतर शिक्षा, आधुनिक तकनीक और आगे बढ़ने के असीमित अवसर दिए जाने चाहिए। जब राज्य का हर एक बच्चा मुस्कुराएगा और अपनी पूरी क्षमता से खिल उठेगा, तभी एक सशक्त, समावेशी और समृद्ध भारत का सपना साकार हो सकेगा।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments