Homeउत्तराखंडदेवभूमि से रामदास अठावले ने पैरालंपिक वीरों की सराहना की, कहा- देश...

देवभूमि से रामदास अठावले ने पैरालंपिक वीरों की सराहना की, कहा- देश का मान बढ़ा रहे हैं हमारे दिव्यांग खिलाड़ी

देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सामाजिक समावेशन और विशेष शिक्षा के क्षेत्र में एक अत्यंत दूरगामी और ऐतिहासिक पहल की शुरुआत हुई है। देहरादून के झाझरा में स्थित आईटीआई दून संस्कृति स्कूल में विशिष्ट अधिगम अक्षमता और ऑटिज्म से प्रभावित बच्चों की पहचान के लिए राज्य के पहले मैपिंग कार्यक्रम की शुरुआत की गई है। केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री श्री रामदास अठावले द्वारा उत्तराखंड राज्य दिव्यांग बाल अभियान के तहत किया गया यह शुभारंभ केवल एक औपचारिक आयोजन भर नहीं है, बल्कि यह देश के पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्रों में छिपी प्रतिभाओं को मुख्यधारा से जोड़ने का एक ठोस प्रशासनिक और सामाजिक प्रयास है।

भारतीय समाज में सदियों से दिव्यांगता को एक अभिशाप या सीमाओं के रूप में देखा जाता रहा है, लेकिन बदलती सोच, आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों और सरकारी प्रतिबद्धता ने इस दृष्टिकोण को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। जब किसी राज्य में बच्चों की सीखने की चुनौतियों और ऑटिज्म जैसे मानसिक तथा तंत्रिका संबंधी विकारों की शुरुआती स्तर पर ही मैपिंग यानी वैज्ञानिक ढंग से पहचान शुरू होती है, तो यह उस समाज के विकसित और संवेदनशील होने का सबसे बड़ा प्रमाण बन जाता है।

राज्य स्तरीय मैपिंग कार्यक्रम का महत्व और दूरगामी प्रभाव
उत्तराखंड जैसे कठिन भौगोलिक बनावट वाले राज्य में विशेष जरूरतों वाले बच्चों तक पहुंच बनाना हमेशा से एक बड़ी चुनौती रहा है। मैपिंग कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य राज्य के हर कोने से ऐसे बच्चों की पहचान करना है जो ऑटिज्म या विशिष्ट अधिगम अक्षमता जैसे विकारों से जूझ रहे हैं। अक्सर देखा गया है कि सही जानकारी और वैज्ञानिक परीक्षण के अभाव में ग्रामीण तथा दूरदराज के क्षेत्रों में बच्चों को मंदबुद्धि या आलसी मान लिया जाता है, जबकि असल में वे किसी विशेष अधिगम अक्षमता से प्रभावित होते हैं।
इस मैपिंग कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों के मानसिक विकास, उनकी सीखने की क्षमता और उनके व्यवहारिक कौशल का विस्तृत आंकड़ा तैयार किया जाएगा। जब एक बार यह डेटाबेस तैयार हो जाएगा, तो प्रशासन और शिक्षा विभाग को यह समझने में आसानी होगी कि किस क्षेत्र में किस प्रकार की विशेष शैक्षणिक सुविधाओं, थेरेपिस्ट और प्रशिक्षित शिक्षकों की आवश्यकता है। यह कदम बच्चों के भविष्य को संवारने में मील का पत्थर साबित होगा क्योंकि शुरुआती अवस्था में ही यदि इन समस्याओं की पहचान कर ली जाए, तो सही मार्गदर्शन से बच्चों के जीवन में अभूतपूर्व सुधार लाया जा सकता है।

समावेशी शिक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण: दून संस्कृति स्कूल की भूमिका
देहरादून के झाझरा स्थित लगभग १३ एकड़ की विशाल भूमि में फैला आईटीआई दून संस्कृति स्कूल समावेशी शिक्षा का एक जीवंत मॉडल प्रस्तुत कर रहा है। इस संस्थान में पूर्वोत्तर राज्यों के लगभग १५० विद्यार्थी और ६७ दिव्यांग विद्यार्थी एक साथ, एक ही प्रांगण में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।
यह वातावरण दो दृष्टियों से बेहद महत्वपूर्ण है:
सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक आदान-प्रदान: पूर्वोत्तर राज्यों के बच्चों और स्थानीय दिव्यांग बच्चों का एक साथ पढ़ना भारत की विविधता में एकता का सुंदर दृश्य पेश करता है। इससे बच्चों में कम उम्र से ही सामाजिक विविधता और एक-दूसरे की संस्कृतियों के प्रति सम्मान की भावना विकसित होती है।
समानता और संवेदनशीलता का भाव: जब सामान्य बच्चे और दिव्यांग बच्चे एक ही वातावरण में साथ खेलते और पढ़ते हैं, तो सामान्य बच्चों में संवेदनशीलता बढ़ती है और दिव्यांग बच्चों में किसी भी प्रकार का हीनभावना का अहसास समाप्त हो जाता है।
केंद्रीय मंत्री श्री रामदास अठावले ने स्वयं स्कूल का भ्रमण कर वहां उपलब्ध शैक्षणिक व आवासीय सुविधाओं का जायजा लिया तथा बच्चों से सीधा संवाद स्थापित किया। उन्होंने संस्थान को और अधिक सशक्त बनाने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय से विशेष अनुदान दिलवाने में सहयोग का आश्वासन भी दिया, जिससे बुनियादी ढांचे को और अधिक सुगम बनाया जा सके।

मन की शक्ति और पैरालंपिक की मिसाल: सामाजिक सोच में बदलाव की जरूरत
समारोह को संबोधित करते हुए केंद्रीय राज्य मंत्री ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही कि दिव्यांगजन शरीर से भले ही कमजोर नजर आएं, लेकिन वे दिल और मन से बहुत मजबूत होते हैं। दिव्यांगता कभी भी किसी व्यक्ति की अंतर्निहित क्षमता, बुद्धिमत्ता और प्रतिभा में बाधा नहीं बन सकती।
इस संदर्भ में उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन करने वाले पैरा-एथलीटों का विशेष रूप से उल्लेख किया। हाल के पैरालंपिक खेलों में भारतीय दिव्यांग खिलाड़ियों ने जिस तरह से दर्जनों स्वर्ण, रजत और कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा है, उसने पूरे देश का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। ये उपलब्धियां इस बात का प्रमाण हैं कि यदि अवसर और सही मार्गदर्शन मिले, तो दिव्यांग बच्चे किसी भी क्षेत्र में सामान्य से भी बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
सामाजिक नजरिए को बदलने की जरूरत आज सबसे ज्यादा है। समाज को इन बच्चों को दया की दृष्टि से देखने के बजाय अवसर और अधिकार देने की मानसिकता अपनानी होगी। जब परिवार और समाज का सहयोग मिलता है, तो ये बच्चे अपनी शारीरिक या मानसिक सीमाओं को लांघकर सफलता के नए आयाम तय करते हैं।

देश में दिव्यांगजनों की स्थिति और केंद्रीय बजट की नीतियां
भारत में २०११ की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार २.६८ करोड़ से अधिक दिव्यांगजन निवास करते हैं। इतनी बड़ी आबादी को विकास की मुख्यधारा से अलग रखकर एक सशक्त भारत की कल्पना नहीं की जा सकती। केंद्र सरकार इस विशाल वर्ग को शिक्षा, कौशल विकास, स्वरोजगार और सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।
सरकार की प्रमुख प्राथमिकताओं और आर्थिक प्रावधानों के मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
आर्थिक बजटीय प्रावधान: दिव्यांगजनों के कल्याण, पुनर्वास और समावेशी कार्यक्रमों के संचालन के लिए लगभग ९५० करोड़ रुपये का विशेष बजट प्रावधान किया गया है।
सुगम्य भारत अभियान: सार्वजनिक भवनों, शैक्षणिक संस्थानों, परिवहन के साधनों और डिजिटल प्लेटफॉर्मों को दिव्यांगजनों के लिए बाधा रहित यानी सुगम बनाया जा रहा है।
कौशल विकास और रोजगार: कौशल प्रशिक्षण के माध्यम से युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने पर बल दिया जा रहा है ताकि वे सम्मानजनक जीवन जी सकें।
प्रौद्योगिकी का समावेश: आधुनिक सहायक उपकरणों और सॉफ्टवेयर तकनीकों के माध्यम से दिव्यांग बच्चों की सीखने की क्षमता को बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

उत्तराखंड सरकार के प्रयास और प्रशासनिक समन्वय
इस अवसर पर उत्तराखंड सरकार द्वारा दिव्यांग कल्याण और समावेशी विकास के क्षेत्र में किए जा रहे कार्यों की भी सराहना की गई। मुख्यमंत्री श्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में राज्य सरकार सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों तक जन कल्याणकारी योजनाओं को पहुंचाने का प्रयास कर रही है।
देहरादून के इस कार्यक्रम में पूर्व सांसद श्री तरुण विजय और राज्य के कैबिनेट मंत्री श्री खजान दास की उपस्थिति यह दर्शाती है कि राज्य में इस विषय को राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर कितनी गंभीरता से लिया जा रहा है। राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच का यह बेहतर समन्वय उत्तराखंड के दूरस्थ गांवों में रहने वाले दिव्यांग बच्चों के लिए नई किरण लेकर आ रहा है।

भविष्य की चुनौतियां और व्यावहारिक समाधान
यद्यपि यह मैपिंग कार्यक्रम एक सराहनीय शुरुआत है, लेकिन इसे अंतिम सफलता तक पहुंचाने के लिए कई व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना होगा:
दुर्गम भौगोलिक स्थिति: उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों में स्थित गांवों तक विशेषज्ञों की टीमों का पहुंचना और वहां मैपिंग शिविर आयोजित करना एक कठिन कार्य है। इसके लिए मोबाइल मेडिकल और टेस्टिंग वैन की व्यवस्था की जानी चाहिए।
विशेष शिक्षकों की कमी: ऑटिज्म और अधिगम अक्षमता से पीड़ित बच्चों को पढ़ाने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी कमी है। इसके लिए राज्य स्तर पर विशेष बीएड और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
सामाजिक जागरूकता का अभाव: ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी मानसिक और तंत्रिका संबंधी विकारों को लेकर अंधविश्वास और हिचकिचाहट देखी जाती है। इसके लिए घर-घर जाकर जागरूकता अभियान चलाना अनिवार्य है।
डिजिटल और भौतिक इंफ्रास्ट्रक्चर: स्कूलों में रैंप, विशेष शौचालय, और टैक्टाइल पाथवे जैसी सुगम व्यवस्थाओं का कड़ाई से पालन होना चाहिए।

देहरादून के आईटीआई दून संस्कृति स्कूल से शुरू हुआ यह मैपिंग कार्यक्रम केवल एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि एक मानवीय मिशन है। यह इस बात का संकल्प है कि उत्तराखंड का कोई भी बच्चा अपनी किसी शारीरिक या मानसिक चुनौती के कारण शिक्षा और प्रगति के अधिकार से वंचित नहीं रहेगा।

जब समाज, सरकार, शैक्षणिक संस्थान और विशेषज्ञ मिलकर काम करते हैं, तो ऑटिज्म या अधिगम अक्षमता जैसी चुनौतियां कभी भी किसी बच्चे के सुनहरे भविष्य की राह का रोड़ा नहीं बन सकतीं। ९५० करोड़ रुपये का केंद्रीय प्रावधान और राज्य सरकार का प्रशासनिक संकल्प यदि धरातल पर पूरी पारदर्शिता के साथ लागू होता है, तो उत्तराखंड देश के अन्य राज्यों के लिए समावेशी शिक्षा का एक रोल मॉडल बनकर उभरेगा।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments