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उत्तराखंड में ‘टी.बी. सील’ का अनावरण: जानें कैसे राज्यपाल गुरमीत सिंह की पहल से बदल रही है राज्य के दूरदराज गांवों की तस्वीर!

उत्तराखंड के लोक भवन में आयोजित एक गरिमामय और दूरगामी महत्व के कार्यक्रम में राज्य के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (सेवानिवृत्त) ने टी.बी. एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड द्वारा आयोजित जनजागरूकता अभियान के तहत ‘टी.बी. सील’ का अनावरण किया। यह आयोजन केवल एक औपचारिक सील जारी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देवभूमि को क्षय रोग (टी.बी.) से पूरी तरह मुक्त बनाने की दिशा में एक सशक्त सामाजिक संदेश और ठोस कार्ययोजना का प्रतीक है। इस अवसर पर राज्यपाल ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि क्षय रोग जैसी घातक और संक्रामक बीमारी के उन्मूलन के लिए केवल स्वास्थ्य विभाग या सरकार के प्रशासनिक तंत्र के प्रयास कभी पर्याप्त नहीं हो सकते। जब तक समाज का अंतिम व्यक्ति, स्थानीय समुदाय, सामाजिक संगठन और आम नागरिक इस अभियान से स्वतःस्फूर्त होकर नहीं जुड़ेंगे, तब तक पूर्ण टी.बी. मुक्‍त भारत और मुक्‍त उत्तराखंड का सपना साकार होना असंभव है।

जनचेतना और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार
राज्यपाल ने अपने संबोधन में क्षय रोग के खिलाफ लड़ाई में सही और सटीक जानकारी को सबसे बड़ा हथियार बताया। उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि आज भी दूरस्थ ग्रामीण और विषम पर्वतीय क्षेत्रों में जागरूकता का अभाव, सामाजिक झिझक और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच एक बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में यह बेहद जरूरी है कि जनजागरूकता के अभियानों को सिर्फ बड़े शहरों या जिला मुख्यालयों तक सीमित न रखकर सुदूर गांवों, पहाड़ियों और दूरदराज की बस्तियों तक पहुंचाया जाए। कोई भी नागरिक केवल इसलिए इलाज से वंचित न रह जाए क्योंकि उसे बीमारी के लक्षणों, मुफ्त जांच सुविधाओं और शासन द्वारा प्रदान की जाने वाली दवाइयों की जानकारी नहीं थी।

‘टी.बी. सील’ का सामाजिक एवं आर्थिक महत्व
टी.बी. एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड हर साल अक्टूबर के महीने में क्षय रोग के प्रति जनचेतना फैलाने और इस दिशा में काम करने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने के उद्देश्य से ‘टी.बी. सील’ जारी करती है। मात्र पांच रुपये के सांकेतिक मूल्य वाली इस सील का महत्व आर्थिक से कहीं अधिक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक है। जब कोई आम नागरिक इस सील को खरीदता है, तो वह न केवल संस्था को एक छोटा सा योगदान देता है, बल्कि वह खुद भी इस राष्ट्रीय स्वास्थ्य अभियान का एक सजग प्रहरी बन जाता है। इस छोटी सी राशि के संग्रह से जो कोष तैयार होता है, उसका उपयोग क्षय रोग के खिलाफ जागरूकता रैलियों, नुक्कड़ नाटकों, स्वास्थ्य शिविरों और मरीजों के पुनर्वास से जुड़ी जनहितकारी गतिविधियों में पारदर्शी तरीके से किया जाता है।

महिला सशक्तिकरण और निक्षय पोषण की दिशा में ठोस पहल
इस विशेष अवसर पर टी.बी. एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड की महासचिव पूनम किमोठी ने संस्था के मानवीकरण प्रयासों और जमीनी स्तर पर हो रहे सकारात्मक बदलावों की विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की। उन्होंने बताया कि किस प्रकार माननीय राज्यपाल के प्रत्यक्ष मार्गदर्शन और सहयोग से संस्था ने क्षय रोग से पूरी तरह ठीक हो चुकी 10 महिलाओं को न केवल स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान की, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने का ऐतिहासिक कदम भी उठाया। इन महिलाओं को सर्वाइकल कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से बचाव के लिए वैक्सिनेशन की तीनों आवश्यक खुराकें लगवाई गईं। इसके साथ ही, उनके दीर्घकालिक सशक्तिकरण और आजीविका संवर्धन के उद्देश्य से सिलाई मशीनें वितरित की गईं। इतना ही नहीं, संस्था द्वारा वर्तमान में हर महीने 13 निर्धन और जरूरतमंद टी.बी. मरीजों को निक्षय पोषण आहार किट भी निरंतर प्रदान की जा रही है, ताकि इलाज के दौरान उनका पोषण स्तर बना रहे और वे जल्द से जल्द स्वस्थ हो सकें।

पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की भौगोलिक चुनौतियां और समाधान
उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से जटिल राज्य में क्षय रोग की रोकथाम एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण कार्य है। पहाड़ी इलाकों में कठिन रास्ते, कड़ाके की ठंड, दूर-दराज फैले गांव और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचने में लगने वाला समय मरीजों के लिए कई बार इलाज में रुकावट बन जाता है। क्षय रोग के लक्षणों जैसे—दो हफ्ते से अधिक समय तक लगातार खांसी रहना, शाम को हल्का बुखार आना, वजन का तेजी से घटना, भूख न लगना और बलगम में खून आना—को लोग अक्सर सामान्य सर्दी-जुकाम या कमजोरी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। इस लापरवाही के कारण बीमारी न केवल मरीज के फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचाती है, बल्कि उसके परिवार और आसपास के अन्य लोगों में भी फैल जाती है। इसलिए पर्वतीय क्षेत्रों में मोबाइल मेडिकल वैन, डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग और स्थानीय आंगनवाड़ी व आशा कार्यकत्रियों के माध्यम से निरंतर निगरानी व्यवस्था को मजबूत करना अनिवार्य है।

सामाजिक भ्रांतियों और छुआछूत के खिलाफ मानसिक बदलाव
क्षय रोग का केवल शारीरिक पहलू ही नहीं होता, बल्कि इसका एक गहरा सामाजिक और आर्थिक पहलू भी है। आज भी हमारे समाज में टी.बी. को लेकर कई तरह की भ्रांतियां, अंधविश्वास और सामाजिक छुआछूत की भावना जुड़ी हुई है। कई बार लोग समाज के डर या लोक-लाज के कारण अपनी बीमारी को छुपाते हैं, जिससे समय पर सही इलाज शुरू नहीं हो पाता। जब तक हम समाज से इस सामाजिक कलंक या झिझक के भाव को खत्म नहीं करेंगे, तब तक मरीजों को सामने लाकर उनका पूर्ण इलाज कराना संभव नहीं होगा। राज्यपाल का यह आह्वान कि ‘प्रत्येक वर्ग की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है’, इसी सामाजिक सोच को बदलने की दिशा में एक मजबूत कदम है।

पोषण की महत्ता और निक्षय आहार योजना की भूमिका
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, क्षय रोग के इलाज में दवाइयों जितनी ही महत्वपूर्ण भूमिका मरीज के सही खान-पान और पोषण की होती है। टी.बी. की दवाइयां काफी तेज होती हैं, जिनका प्रभाव सहन करने के लिए मरीज के शरीर में पर्याप्त ताकत और पोषक तत्वों का होना बेहद जरूरी है। यदि मरीज कुपोषित है, तो दवाइयों का असर धीमा हो जाता है और बीमारी के दोबारा उभरने या दवा-प्रतिरोधी टी.बी. में बदलने का खतरा बढ़ जाता है। केंद्र सरकार की निक्षय पोषण योजना और टी.बी. एसोसिएशन जैसी संस्थाओं द्वारा दिए जाने वाले निक्षय पोषण आहार इस दिशा में वरदान साबित हो रहे हैं। जब किसी मरीज को नियमित प्रोटीन, विटामिन और संतुलित आहार मिलता है, तो उसके स्वस्थ होने की दर कई गुना बढ़ जाती है।

मरीज के सर्वांगीण पुनर्वास और सुरक्षा का अनूठा मॉडल
उत्तराखंड में चलाए जा रहे इस अभियान की एक सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह केवल बीमारी के इलाज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मरीज के सर्वांगीण पुनर्वास पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। राज्यपाल के सहयोग से टी.बी. से मुक्त हुई महिलाओं को सिलाई मशीनें देना और सर्वाइकल कैंसर से बचाव का टीका लगवाना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उत्तराखंड स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक समग्र दृष्टिकोण अपना रहा है। जब कोई मरीज टी.बी. से ठीक होता है, तो उसे समाज में फिर से सिर उठाकर जीने और अपनी आजीविका चलाने का अवसर मिलना चाहिए। महिलाओं को रोजगार के साधन उपलब्ध कराकर उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाना और साथ ही महिला जन्य कैंसर से सुरक्षित करना एक अनुकरणीय और क्रांतिकारी पहल है, जिसे पूरे देश में मॉडल के रूप में अपनाया जा सकता है।

टी.बी. मुक्त भारत के संकल्प में उत्तराखंड की अनुकरणीय भूमिका
टी.बी. मुक्त भारत के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने में उत्तराखंड की यह पहल अत्यंत प्रेरणादायक है। पांच रुपये की टी.बी. सील के जरिए जन-जन को जोड़ना, निक्षय मित्रों के माध्यम से मरीजों को गोद लेना और दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य तंत्र का विस्तार करना यह साबित करता है कि संकल्प यदि दृढ़ हो तो बड़ी से बड़ी बीमारी को भी परास्त किया जा सकता है। क्षय रोग एक ऐसी बीमारी है जिसका इलाज पूरी तरह संभव है और सरकारी अस्पतालों में इसकी जांच व दवाइयां शत-प्रतिशत मुफ्त उपलब्ध हैं। बस आवश्यकता है तो केवल समय पर पहचान, निरंतर और पूरा इलाज, सही पोषण और समाज का आत्मीय सहयोग।

जन-आंदोलन से ही संभव है पूर्ण उन्मूलन
लोक भवन में आयोजित इस कार्यक्रम ने राज्य में टी.बी. उन्मूलन की जंग को एक नया उत्साह और नई दिशा दी है। राज्यपाल के इस आह्वान को यदि राज्य का प्रत्येक नागरिक अपने कर्तव्य के रूप में स्वीकार कर ले, तो वह दिन दूर नहीं जब उत्तराखंड देश का पहला पूर्ण टी.बी. मुक्त राज्य बनकर एक नया इतिहास रचेगा। यह अभियान केवल स्वास्थ्य विभाग का सरकारी कार्यक्रम न रहकर एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है, जिसमें हर नागरिक की भागीदारी ही इसकी वास्तविक सफलता की कुंजी है।

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