नाना पाटेकर: भारतीय सिनेमा के सौ से भी अधिक वर्षों के इतिहास में जहाँ अनगिनत सितारे अपनी सुंदरता, नृत्य या लच्छेदार शैली के दम पर आए और गए, वहीं इस चमक-दमक से परे एक अलग ही सितारा उभरा। जिसने कभी न तो पारंपरिक हीरो की तरह दिखने का प्रयास किया और न ही ग्लैमर की दौड़ में शामिल हुआ, फिर भी जब पर्दे पर कदम रखा, तो अपनी आँखों के अंगारों, तीखे संवादों और गहरी खामोशी से करोड़ों दर्शकों को झकझोर कर रख दिया। विश्वनाथ पाटेकर, जिन्हें दुनिया ‘नाना पाटेकर’ के नाम से जानती है, साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर अभिनय के सर्वोच्च शिखर तक पहुँचे। वे केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि कला, सत्य और सामाजिक जिम्मेदारी के एक जीवित स्तंभ हैं, जिनका जीवन यह साबित करता है कि मज़बूत इरादों और ईमानदारी के बल पर एक साधारण व्यक्ति भी पूरी पीढ़ी का नायक बन सकता है।
संघर्ष के थपेड़ों से तराशा गया एक अनमोल हीरा
नाना पाटेकर के जीवन की शुरुआत किसी फिल्मी कहानी से कम दुखद और संघर्षपूर्ण नहीं थी। महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजीरा में एक बहुत ही साधारण परिवार में जन्मे नाना का बचपन से ही दुखों से सामना हो गया था। परिवार आर्थिक तंगी से गुजर रहा था और पिता का व्यापार पूरी तरह ठप हो चुका था। जीवन यापन करने और अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए बहुत छोटी उम्र में ही नाना को काम पर लगना पड़ा। वे मुंबई की सड़कों पर वाणिज्यिक विज्ञापनों और फिल्मों के पोस्टरों को पेंट करने का काम करते थे।
कम उम्र में ही परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियों का बोझ उठाना और दिन-रात कड़ी मेहनत करना किसी भी इंसान को तोड़ सकता है। लेकिन नाना ने इस दर्द को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने सड़कों के इस संघर्ष, लोगों के दोहरे चेहरों और समाज की कड़वी सच्चाई को बहुत करीब से देखा। यही कड़वा अनुभव आगे चलकर उनके अभिनय में उस आग के रूप में बदला, जिसने पर्दे पर उन्हें एक साधारण अभिनेता से एक असाधारण कलाकार बना दिया। जब वे पर्दे पर किसी गरीब, परेशान या शोषित इंसान का दर्द बयां करते थे, तो उन्हें नाटक नहीं करना पड़ता था; क्योंकि वह दर्द उन्होंने खुद अपनी जिंदगी में जिया था।
रंगमंच की तपस्या और बॉलीवुड में धमाकेदार दस्तक
सिनेमा की रंगीन दुनिया में कदम रखने से पहले नाना पाटेकर ने थियेटर यानी रंगमंच की दुनिया में सालों तक पसीना बहाया। मराठी और हिंदी नाटकों में अभिनय करते हुए उन्होंने अपनी आवाज, अपनी भाषा की शैली और शारीरिक हाव-भाव पर असाधारण पकड़ बनाई। रंगमंच एक ऐसा मंच है जहाँ किसी कलाकार को अपनी गलती सुधारने का दूसरा मौका नहीं मिलता, और इसी तपस्या ने नाना को एक मंझा हुआ कलाकार बनाया।
हिंदी सिनेमा में उनकी शुरुआत अस्सी के दशक में हुई, लेकिन पूरी दुनिया का ध्यान उनकी तरफ तब गया जब प्रसिद्ध निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा ने उन्हें अपनी फिल्म ‘परिंदा’ में एक बेरहम और सनकी अंडरवर्ल्ड डॉन ‘अन्ना’ की भूमिका दी। इस फिल्म में नाना ने जिस तरह से एक क्रूर अपराधी के मानसिक पागलपन और उसके डर को पर्दे पर उतारा, उसने पूरे बॉलीवुड को हैरान कर दिया। ‘परिंदा’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इस फिल्म ने यह साबित कर दिया कि भारतीय सिनेमा में एक नए युग की शुरुआत हो चुकी है—एक ऐसा युग जहाँ अब सिर्फ खूबसूरत चेहरों की जरूरत नहीं थी, बल्कि दमदार अभिनय का राज चलने वाला था।
क्रांतिवीर से लेकर खामोशी तक: अभिनय की विविधता का अनूठा उदाहरण
नाना पाटेकर की सबसे बड़ी खासियत उनकी बहुमुखी प्रतिभा रही है। उन्होंने कभी भी खुद को किसी एक खास तरह की भूमिका में बांधकर नहीं रखा। नब्बे के दशक में आई फिल्म ‘क्रांतिवीर’ उनके करियर का सबसे बड़ा मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म में उन्होंने एक बेपरवाह और बाद में समाज की व्यवस्था से लड़ने वाले एक क्रांतिकारी युवक ‘प्रताप’ का किरदार निभाया। फिल्म का वो आखिरी दृश्य, जहाँ वे फांसी के फंदे के पास खड़े होकर भीड़ और समाज को ललकारते हैं, आज भी भारतीय सिनेमा के सबसे महान दृश्यों में गिना जाता है। इस फिल्म में बोले गए उनके एक-एक संवाद ने देश के हर नागरिक के खून में उबाल ला दिया था। ‘क्रांतिवीर’ के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘खामोशी: द म्यूजिकल’ में उन्होंने एक ऐसे पिता की भूमिका निभाई जो सुन और बोल नहीं सकता। बिना एक भी शब्द बोले, केवल अपने चेहरे के हाव-भाव, हाथों के इशारों और आँखों की नमी से उन्होंने एक बाप की लाचारी, अपनी बेटी के प्रति प्रेम और अपने आत्मसम्मान को जिस तरह पर्दे पर जिया, उसने दर्शकों की आँखों में आंसू ला दिए। यह फिल्म इस बात का सबूत थी कि नाना जितने तीखे संवाद बोल सकते हैं, उनकी खामोशी में उससे भी कहीं ज्यादा गहराई और ताकत है।
इसके अलावा, फिल्म ‘अपहरण’ में एक सख्त और उसूलों वाले पिता का किरदार हो या फिर ‘वजूद’ और ‘प्रहार’ जैसी फिल्में, नाना ने हर बार एक नया रूप दिखाया। फिल्म ‘प्रहार’ के लिए तो उन्होंने बाकायदा भारतीय सेना के साथ मिलकर कठिन कमांडो ट्रेनिंग ली थी, ताकि उनका किरदार पूरी तरह से असली लग सके। बहुत कम लोग जानते हैं कि नाना को भारतीय प्रादेशिक सेना में मानद कैप्टन का पद भी दिया गया था।
कॉमेडी की दुनिया में ‘उदय शेट्टी’ बनकर जीता हर दिल
गंभीर, गुस्से वाले और सामाजिक मुद्दों पर आधारित किरदार निभाने वाले नाना पाटेकर जब कॉमेडी के मैदान में उतरे, तो उन्होंने वहां भी झंडे गाड़ दिए। फिल्म ‘वेलकम’ में उनके द्वारा निभाया गया गेंगस्टर ‘उदय भाई’ या ‘उदय शेट्टी’ का किरदार आज के डिजिटल युग में भी अमर हो चुका है। “कंट्रोल मजनू कंट्रोल” जैसे उनके संवाद आज भी बच्चे-बच्चे की जुबान पर हैं और इंटरनेट पर मीम्स की दुनिया में छाए रहते हैं।
एक ऐसा अभिनेता जो पर्दे पर किसी को भी डरा सकता था, उसने लोगों को पेट पकड़कर हंसने पर मजबूर कर दिया। यह दिखाता है कि एक सच्चे कलाकार के लिए कला की कोई सीमा नहीं होती। उन्होंने यह साबित किया कि गंभीरता और हास्य, दोनों ही कला के दो पहलू हैं और वे दोनों में ही महारत रखते हैं।
अभिनय से परे: नामदेव फाउंडेशन और किसानों के मसीहा
नाना पाटेकर की महानता केवल इस बात में नहीं है कि वे एक बहुत बेहतरीन अभिनेता हैं, बल्कि इस बात में है कि वे एक बहुत ही संवेदनशील और महान इंसान हैं। जब महाराष्ट्र में सूखा पड़ने के कारण सैकड़ों गरीब किसान कर्ज के बोझ तले दबकर आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे थे, तब जहाँ ज्यादातर बड़ी हस्तियां केवल सोशल मीडिया पर दुख जता रही थीं, वहीं नाना पाटेकर खुद सड़कों पर उतरे।
उन्होंने प्रसिद्ध मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर ‘नाम फाउंडेशन’ नाम की एक धर्मार्थ संस्था की स्थापना की। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने सूखा प्रभावित इलाकों में जाकर खुद पीड़ित किसानों के परिवारों से मुलाकात की, उनके आंसू पोंछे और उन्हें सीधे आर्थिक मदद पहुंचाई। नाना और उनकी संस्था ने गांवों में जल संरक्षण, नदियों के पुनरुद्धार, तालाबों के निर्माण और किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए दिन-रात काम किया।
नाना पाटेकर के पास पैसों और शोहरत की कोई कमी नहीं रही, लेकिन वे आज भी एक बहुत ही साधारण जीवन जीते हैं। वे मुंबई के एक छोटे से मकान में रहते हैं और अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा गरीब और जरूरतमंद लोगों की भलाई में लगा देते हैं। वे अक्सर कहते हैं कि जब देश का किसान भूखा सो रहा हो, तो एक कलाकार को अय्याशी की जिंदगी जीने का कोई हक नहीं है। उनकी यही सादगी और निस्वार्थ समाज सेवा उन्हें जनता का असली नायक बनाती है।
एक निर्भीक व्यक्तित्व और निडर आवाज
नाना पाटेकर का व्यक्तित्व उनके किरदारों की तरह ही बिल्कुल साफ और निडर है। वे कभी भी किसी के दबाव में आकर सच बोलने से पीछे नहीं हटते। चाहे राजनीतिक मुद्दा हो, समाज की बुराइयां हों या फिर फिल्म उद्योग का दोहरापन, नाना ने हमेशा अपनी बात को बेबाकी से रखा है। उन्होंने कभी भी किसी चापलूसी का सहारा नहीं लिया और न ही कभी पुरस्कारों या प्रशंसा के पीछे भागे।
उनकी इसी निडरता और साफगोई की वजह से कई बार वे विवादों में भी रहे, लेकिन उनके प्रशंसकों का प्यार उनके लिए कभी कम नहीं हुआ। लोग जानते हैं कि नाना पाटेकर जो बोलते हैं, वह सीधे उनके दिल से निकलता है और उसमें कोई बनावट या दिखावा नहीं होता।
भारतीय समाज और कला पर नाना पाटेकर का प्रभाव
नाना पाटेकर का योगदान केवल कुछ सफल फिल्में देना भर नहीं है। उन्होंने भारतीय सिनेमा में अभिनय की परिभाषा को बदलने का काम किया है। उन्होंने यह दिखाया कि अभिनय किसी बनी-बनाई शैली का मोहताज नहीं होता। एक कलाकार अपनी मौलिकता, अपनी आवाज के उतार-चढ़ाव और अपने चेहरे के भावों से ही दर्शकों के दिलों पर राज कर सकता है।
आज की युवा पीढ़ी के अभिनेताओं के लिए नाना पाटेकर एक खुली किताब और अभिनय की एक पूरी पाठशाला हैं। उनसे यह सीखा जा सकता है कि किसी किरदार में किस तरह से अपनी आत्मा को उड़ेल दिया जाता है। उनका पूरा जीवन हमें यह सिखाता है कि सफलता मिलने के बाद भी अपनी जड़ों से जुड़े रहना कितना जरूरी है।
नाना पाटेकर आज भी भारतीय सिनेमा के गगन में एक ऐसे ध्रुव तारे की तरह चमक रहे हैं, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ सकती। उनकी फिल्में, उनके तीखे संवाद, उनकी जादुई खामोशी और किसानों के लिए किया गया उनका काम आने वाली कई पीढ़ियों को प्रेरित करता रहेगा। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि वे दीर्घायु हों और उनका मार्गदर्शन समाज व कला जगत को यूं ही मिलता रहे।


