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प्रकृति की शांत गोद में बसे लेखक गांव में राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने किया ‘‘अंतर्राष्ट्रीय साहित्य, संस्कृति एवं कला महोत्सव-2026‘‘ का भव्य शुभारंभ

प्रकृति की शांत और मनोरम गोद में बसी देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून से सटे थानों क्षेत्र का लेखक गांव इन दिनों वैचारिक ऊर्जा, साहित्यिक चर्चाओं और सांस्कृतिक बहसों का केंद्र बन चुका है। यहां आयोजित पांच दिवसीय ‘‘अंतर्राष्ट्रीय साहित्य, संस्कृति एवं कला महोत्सव-2026‘‘ का भव्य शुभारंभ मुख्य अतिथि एवं राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन के कर-कमलों द्वारा अत्यंत गरिमामयी माहौल में संपन्न हुआ। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन की गरिमामयी उपस्थिति ने इस आयोजन की महत्ता को और बढ़ा दिया, जहाँ उन्होंने देश-विदेश और सात समंदर पार से पहुंचे साहित्यकारों, मूर्धन्य विचारकों, कलाकारों और संस्कृति के संवाहकों का उत्साहवर्धन किया। राज्यपाल महोदय के मार्गदर्शन में यह आयोजन महज़ एक उत्सव न बनकर विचारों का ऐसा संगम सिद्ध हो रहा है, जो मानवीय संवेदनाओं को गहराई प्रदान करने और वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक संवाद को मजबूत करने का ऐतिहासिक मंच साबित हो रहा है। डॉ. बिसेन की उपस्थिति और उनके ओजस्वी संबोधन ने यह साबित कर दिया है कि उत्तराखंड केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि बौद्धिक और साहित्यिक चेतना के मामले में भी दुनिया भर में एक विशिष्ट पहचान रखता है।

साहित्य, संस्कृति और कला: मानवता को पिरोने वाले अदृश्य धागे

आज की इस भागदौड़ भरी दुनिया में जहां भौतिकता और कृत्रिमता हावी होती जा रही है, वहां साहित्य, संस्कृति और कला किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं हैं। महोत्सव के शुभारंभ अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में अपने विचार साझा करते हुए राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने बहुत ही सारगर्भित बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि साहित्य, संस्कृति और कला किसी एक समुदाय या देश की बपौती नहीं हैं, बल्कि यह पूरी मानवता को आपस में पिरोने वाले वे अदृश्य धागे हैं, जो दिलों की दूरियों को मिटा देते हैं। जब कोई लेखक अपनी रचना लिखता है या कोई कलाकार अपनी कला को मंच पर उतारता है, तो वह किसी सरहद या भाषा की सीमा में नहीं बंधा होता, बल्कि उसकी रचना सीधे इंसानी दिल तक पहुंचती है।

इस पाँच दिवसीय महोत्सव का उद्देश्य भी यही है कि विभिन्न संस्कृतियों के लोग एक मंच पर आएं, अपने अनुभव साझा करें और वैचारिक मतभेदों से ऊपर उठकर मानवता के कल्याण के लिए एक साझा मंच तैयार करें। यह आयोजन इस बात का गवाह बन रहा है कि कैसे विभिन्न संस्कृतियों के प्रतिनिधि एक-दूसरे के करीब आ रहे हैं और आपसी सद्भाव की एक नई इबारत लिख रहे हैं।

स्थानीय भाषाओं की महत्ता और हिमालयी पर्यावरण का संरक्षण

किसी भी समाज की जड़ें उसकी मातृभाषा और उसकी स्थानीय संस्कृति में गहराई तक समाहित होती हैं। राज्यपाल ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष जोर दिया कि हमें अपनी स्थानीय भाषाओं और बोलियों में साहित्य-सृजन को बढ़ावा देना चाहिए। जब तक हमारी स्थानीय भाषाएं जीवित रहेंगी, तब तक हमारी संस्कृति और हमारा पारंपरिक ज्ञान भी सुरक्षित रहेगा। इसके साथ ही, अनुवाद और शोध कार्यों को भी बड़े पैमाने पर प्रोत्साहित किए जाने की आवश्यकता है ताकि क्षेत्रीय साहित्य को वैश्विक मंच मिल सके और दुनिया भर के पाठक हमारी स्थानीय कहानियों और संस्कारों से परिचित हो सकें।

इसके अलावा, हिमालय क्षेत्र के पर्यावरण, यहाँ की समृद्ध जैवविविधता और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का मुद्दा भी इस साहित्यिक महाकुंभ के केंद्र में रहा। हिमालय केवल भारत का प्रहरी नहीं है, बल्कि यह इस उपमहाद्वीप के पर्यावरण का मुख्य आधार है। आज जिस तरह से जलवायु परिवर्तन और अंधाधुंध विकास के कारण प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है, उस पर गंभीर चिंतन करने की जरूरत है। वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि विकास और प्रकृति के बीच एक स्वस्थ संतुलन होना अनिवार्य है। यदि हमने आज पर्यावरण संरक्षण को अपने साहित्य और विमर्श का हिस्सा नहीं बनाया, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुरक्षित भविष्य की कल्पना करना भी बेमानी होगा।

युवा पीढ़ी और वैचारिक सृजनशीलता: भविष्य की नींव

किसी भी राष्ट्र का मजबूत या कमजोर भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी युवा पीढ़ी किस दिशा में आगे बढ़ रही है। उनका ज्ञान, उनके संस्कार और उनकी सृजनशीलता ही यह तय करती है कि आने वाले कल में समाज का स्वरूप कैसा होगा। आज के दौर में जब युवा पीढ़ी सोशल मीडिया और स्क्रीन की दुनिया में सिमटती जा रही है, तब उनमें किताबें पढ़ने की आदत, मौलिक चिंतन और अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान का भाव जगाना सबसे बड़ी चुनौती भी है और जरूरत भी।

साहित्य हमें गहराई से सोचना सिखाता है, जबकि आज की तकनीक हमें सतही और तेज जानकारी देती है। आधुनिक तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता निस्संदेह साहित्य के संरक्षण, डिजिटलीकरण और उसके प्रसार में बहुत बड़ी मदद कर रहे हैं, लेकिन साहित्य की असली ताकत मशीनों में नहीं, बल्कि मानवीय संवेदना और मौलिक चिंतन में बसती है। यदि युवा तकनीक का इस्तेमाल तो करें लेकिन अपनी मौलिक सोच और संवेदनाओं को जीवित रखें, तो वे समाज में सकारात्मक बदलाव के सच्चे अग्रणी बन सकते हैं।

राष्ट्रीय एकता, सामाजिक समरसता और लेखक गांव की अनूठी परिकल्पना

साहित्यकारों और विचारकों की यह जिम्मेदारी सबसे बड़ी होती है कि वे अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज में फैली कुरीतियों, दूरियों और कटुता को मिटाकर एकता का संदेश दें। इस महोत्सव में पधारे सभी विद्वानों ने एक स्वर में राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को बनाए रखने पर जोर दिया। पर्यावरण संरक्षण से लेकर आपसी भाईचारे तक, जनचेतना जगाने का जो बीड़ा साहित्यकारों ने उठाया है, वह आने वाले समय में समाज को एक नई दिशा देगा।

इस पूरे आयोजन की पृष्ठभूमि में थानों स्थित ‘लेखक गांव’ की परिकल्पना एक मील का पत्थर साबित हो रही है। इस अनूठी पहल के संरक्षक और प्रख्यात साहित्यकार डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ तथा उनकी पूरी टीम ने जिस विजन के साथ इस स्थान को गढ़ा है, वह वाकई सराहनीय है। यह गांव केवल ईंट-पत्थरों से बनी इमारत नहीं है, बल्कि यह देश-विदेश के साहित्यकारों, शोधार्थियों और नवोदित प्रतिभाओं के लिए एक ऐसा ऊर्जा केंद्र बन चुका है, जहां आकर हर रचनाकार को अपनी कला को निखारने का अवसर मिलता है।

पुस्तकों का विमोचन और वैश्विक दिग्गजों की गरिमामयी उपस्थिति

इस पांच दिवसीय महोत्सव के उद्घाटन सत्र के दौरान कुछ बेहद महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों का विमोचन भी किया गया। राज्यपाल महोदय के कर-कमलों से ‘लेखक गाँव काफी टेबल बुक’ और ‘लेखक गाँव सृजन यात्रा 2025-26’ पुस्तकों का लोकार्पण हुआ। ये दोनों पुस्तकें इस बात का दस्तावेज हैं कि कैसे पिछले कुछ वर्षों में इस लेखक गांव ने अपनी एक लंबी और गौरवशाली यात्रा तय की है और कैसे इसने साहित्य की सेवा में अपना योगदान दिया है।

इस भव्य कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाने के लिए दुनिया भर से नामचीन हस्तियां उपस्थित थीं। इस अवसर पर मॉरीशस के पूर्व राष्ट्रपति श्री पृथ्वीराज सिंह रूपन विशेष रूप से उपस्थित रहे, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक रिश्तों को मजबूत करने पर बल दिया। इसके अलावा लेखक गांव के संस्थापक डॉ. रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, उत्तराखंड के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री सतपाल महाराज, परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानंद मुनि, रवीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय भोपाल के कुलाधिपति एवं प्रख्यात साहित्यकार संतोष चौबे, ब्रिटेन के जाने-माने प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा, और लेखक गांव की निदेशक विदुषी निशंक सहित देश-विदेश के तमाम प्रतिष्ठित साहित्यकार और बुद्धजीवी मौजूद रहे। इन सभी महानुभावों की उपस्थिति ने इस आयोजन को एक ऐतिहासिक और वैश्विक स्वरूप प्रदान कर दिया है।

थानों के लेखक गांव में शुरू हुआ यह अंतर्राष्ट्रीय साहित्य, संस्कृति एवं कला महोत्सव-2026 महज़ पांच दिनों का एक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि यह आने वाले कई वर्षों तक वैचारिक दिशा तय करने वाला एक आंदोलन है। जिस प्रकार यहाँ देश और दुनिया के कोने-कोने से आए साहित्यकार अपने विचारों का आदान-प्रदान कर रहे हैं, उससे यह साफ जाहिर होता है कि साहित्य की धारा कभी रुकती नहीं है। यह हमेशा समाज को सींचती रहती है और इंसानी दिलों को आपस में जोड़े रखती है। देवभूमि की यह पावन धरा एक बार फिर से संपूर्ण विश्व को यह संदेश दे रही है कि संवाद, संस्कृति और साहित्य के माध्यम से ही एक सुंदर, शांत और समरस दुनिया का निर्माण किया जा सकता है।

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