स्वास्थ्य समस्या ही नहीं, एक सामाजिक और आर्थिक चुनौती
क्षय रोग को केवल एक शारीरिक बीमारी मानना इसके वास्तविक असर को कम आंकने जैसा है। राज्यपाल ने इस बात पर गहरा प्रकाश डाला कि जब परिवार का कोई व्यक्ति इस बीमारी की चपेट में आता है, तो इसका असर केवल उसके फेफड़ों या शरीर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा परिवार इसके सामाजिक और आर्थिक दुष्परिणाम झेलता है। बीमारी के लंबे इलाज और काम करने की क्षमता प्रभावित होने के कारण कई परिवार गरीबी के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं। आजीविका का संकट खड़ा हो जाता है और समाज में फैली भ्रांतियों के कारण मरीज खुद को अलग-थलग महसूस करने लगता है।
इसी वजह से राज्यपाल ने समाज से आग्रह किया कि टीबी पीड़ितों के प्रति सहानभूति, सहयोग और संवेदनशीलता का दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है। जब तक पीड़ित व्यक्ति को सामाजिक सुरक्षा और मानसिक संबल नहीं मिलेगा, तब तक वह खुलकर इलाज के लिए आगे नहीं आएगा। समाज में व्याप्त भेदभाव की भावना को समाप्त कर पीड़ित को सम्मानजनक जीवन प्रदान करना इस लड़ाई की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है।
राष्ट्रीय अभियानों और जनभागीदारी का स्वर्णिम दौर
केंद्र सरकार द्वारा चलाए जा रहे विभिन्न अभियानों की सराहना करते हुए राज्यपाल ने कहा कि देश में स्वास्थ्य क्षेत्र के भीतर एक अभूतपूर्व क्रांति देखने को मिल रही है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में संचालित अभियानों ने टीबी के खिलाफ लड़ाई को एक नया आयाम दिया है:
- प्रधानमंत्री टीबी मुक्त भारत अभियान: इस योजना ने देश भर में क्षय रोग के प्रति एक राष्ट्रीय चेतना जगाई है और प्रशासनिक तंत्र को इस दिशा में पूरी तरह सक्रिय किया है।
- निक्षय पोषण योजना: इलाज के दौरान मरीजों को बेहतर पोषण प्रदान करने के लिए दी जाने वाली वित्तीय सहायता ने कुपोषण और बीमारी के दोहरे चक्र को तोड़ने में बड़ी सफलता हासिल की है।
- निक्षय मित्र पहल: इस अनोखी पहल ने सामान्य नागरिकों, सामाजिक संस्थाओं और कॉर्पोरेट जगत को मरीजों की सीधी मदद करने का अवसर दिया है। कोई भी व्यक्ति किसी मरीज को गोद लेकर उसके पोषण और इलाज की जिम्मेदारी उठा सकता है।
- टीबी मुक्त पंचायत अभियान: जमीनी स्तर पर पंचायतों को अधिकार संपन्न बनाकर ग्रामीण क्षेत्रों में बीमारी की पहचान और इलाज को अत्यधिक सुलभ बनाया गया है।
राज्यपाल ने रेखांकित किया कि किसी भी सरकारी योजना की वास्तविक सफलता जनभागीदारी में निहित होती है। जब तक आम नागरिक खुद को इस राष्ट्रीय संकल्प से नहीं जोड़ेगा, तब तक शत-प्रतिशत लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा।
पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक चुनौतियां और तकनीक का समाधान
उत्तराखंड जैसे कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले हिमालयी राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार एक अत्यंत जटिल कार्य है। दुर्गम पहाड़, गहरी घाटियां, लंबी दूरियां और मौसम की अनिश्चितता अक्सर दूरदराज के गांवों तक समय पर दवाइयां और जांच सुविधाएं पहुंचाने में बड़ी बाधा बनती हैं। ऐसे में पारंपरिक स्वास्थ्य ढांचा कई बार असहाय नजर आने लगता है।
इस चुनौती का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करते हुए राज्यपाल ने तकनीक के प्रयोग पर बल दिया। उन्होंने एम्स ऋषिकेश द्वारा दुर्गम क्षेत्रों में दवाइयां पहुंचाने के लिए शुरू की गई ड्रोन तकनीक की खुलकर तारीफ की। उन्होंने कहा कि ड्रोन के माध्यम से जहां पहले दवा पहुंचने में घंटों या दिन लगते थे, वहां अब कुछ ही मिनटों में जीवन रक्षक दवाएं पहुंचाई जा रही हैं। यह पहल इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति का सही तालमेल हो, तो पहाड़ों की ऊंचाई और दूरियां भी स्वास्थ्य सेवाओं की राह में रोड़ा नहीं बन सकतीं।
स्वास्थ्य सेवाओं की सफलता का वास्तविक पैमाना
अपने संबोधन में राज्यपाल ने स्वास्थ्य सेवाओं के मूल्यांकन के पारंपरिक तरीकों पर भी सवाल उठाया और एक नया दृष्टिकोण सामने रखा। उन्होंने कहा कि किसी भी अस्पताल या स्वास्थ्य प्रणाली की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वहां कितनी जांचें की गईं या कितनी महंगी मशीनें स्थापित की गई हैं।
सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि: १. किसी भी संदिग्ध मरीज की पहचान कितनी शीघ्रता और सटीकता से की गई। २. पहचान होने के बाद उसका सही उपचार कितनी तेजी से शुरू किया गया। ३. मरीज को दवाइयों के साथ-साथ सही समय पर आवश्यक पोषण मिला या नहीं।
वैज्ञानिक अनुसंधानों और उच्चस्तरीय तकनीक का वास्तविक औचित्य तभी सिद्ध होता है जब उनसे किसी आम इंसान का जीवन सुरक्षित बने और उसके जीवन स्तर में सुधार आए। यदि तकनीक अंतिम व्यक्ति की पीड़ा दूर नहीं कर पा रही है, तो वह केवल एक शो-पीस बनकर रह जाती है।
धरातल पर डटे योद्धा: आशा, निक्षय मित्र और टीबी चैंपियंस
क्षय रोग उन्मूलन की इस पूरी व्यवस्था में धरातल पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं के योगदान को राज्यपाल ने सर्वोपरि बताया। उन्होंने आशा कार्यकर्ताओं, निक्षय मित्रों और टीबी चैंपियंस को स्वास्थ्य व्यवस्था और आम जनता के बीच की सबसे मजबूत कड़ी करार दिया।
- आशा कार्यकर्ता: ये ग्रामीण क्षेत्रों में घर-घर जाकर संदिग्ध मरीजों की पहचान करती हैं, उन्हें जांच केंद्र तक लाती हैं और नियमित दवा सेवन सुनिश्चित कराती हैं।
- निक्षय मित्र: ये वे संवेदनशील नागरिक और संगठन हैं जो मरीजों को पोषण पोटली प्रदान कर उनका मनोबल बढ़ाते हैं।
- टीबी चैंपियंस: वे लोग जो स्वयं इस बीमारी को हराकर पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं और अब अपने अनुभवों से दूसरों को जागरूक कर रहे हैं। ये लोग समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
राज्यपाल ने कहा कि टीबी से जुड़ी सामाजिक भ्रांतियों, कलंक और डर को दूर करने में इन योद्धाओं की भूमिका ऐतिहासिक है। समाज को यह समझना होगा कि टीबी कोई असाध्य या छुआछूत की ऐसी बीमारी नहीं है जिससे मरीज को बेदखल कर दिया जाए। सही इलाज और सहयोग से मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है। इसलिए पीड़ित को दूरी और दुत्कार नहीं, बल्कि सम्मान, विश्वास और अपनापन चाहिए।
ठोस नीतियों में बदले विचार-विमर्श
सम्मेलन के समापन संदेश में राज्यपाल ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि ऋषिकेश में आयोजित यह राष्ट्रीय सम्मेलन केवल औपचारिक चर्चाओं और भाषणों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। सम्मेलन में देश भर से आए विशेषज्ञों द्वारा प्रस्तुत किए गए विचारों, अध्ययनों और सुझावों को धरातल पर लागू होने वाली ठोस कार्ययोजना और नीतियों में बदला जाना चाहिए।
उन्होंने विश्वास जताया कि एम्स ऋषिकेश अपनी अनुसंधान क्षमताओं और उत्कृष्ट चिकित्सा सुविधाओं के बल पर इस दिशा में देश को नेतृत्व प्रदान कर सकता है। एम्स ऋषिकेश में विकसित किए गए सफल मॉडल न केवल उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए, बल्कि देश के अन्य सभी दुर्गम और पर्वतीय राज्यों के लिए भी एक आदर्श मार्गदर्शक सिद्ध होंगे।
इस भव्य कार्यक्रम में राज्य के स्वास्थ्य मंत्री सुबोध उनियाल, एम्स ऋषिकेश की कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर डॉक्टर मीनू सिंह, पॉलिसी रेजीलेंस फाउंडेशन के निदेशक नंदीश आर पैठानी, आयोजन समिति की अध्यक्ष डॉक्टर प्रतिमा गुप्ता, डॉक्टर गिरीश सिंधवानी सहित देश भर से आए प्रसिद्ध चिकित्सक और स्वास्थ्य नीति विशेषज्ञ उपस्थित रहे।


