एसएसपी अजय सिंह का बड़ा एक्शन: साइबर ठगी मामले में उत्तराखंड एसटीएफ की बड़ी कार्रवाई का पूरा घटनाक्रम
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत तब हुई जब देहरादून स्थित साइबर अपराध पुलिस स्टेशन में तीन करोड़ बीस लाख रुपये की धोखाधड़ी की एक प्राथमिकी दर्ज कराई गई। कंपनी के प्रतिनिधियों ने पुलिस को दी गई शिकायत में बताया कि उनकी संस्था के महाप्रबंधक से व्हाट्सएप पर एक अज्ञात व्यक्ति ने संपर्क साधा। उस व्यक्ति ने खुद को कंपनी का शीर्ष अधिकारी और प्रबंध निदेशक बताया। बातचीत के दौरान उसने बहुत ही पेशेवर और प्रभावकारी तरीके से महाप्रबंधक का भरोसा जीत लिया।
इसके बाद आरोपी ने एक कथित बड़े प्रोजेक्ट का हवाला दिया और कहा कि इस प्रोजेक्ट को शुरू करने के लिए तुरंत अग्रिम भुगतान की आवश्यकता है। उसने कुछ अन्य व्यावसायिक भुगतानों का बहाना भी बनाया। महाप्रबंधक को जरा भी शक नहीं हुआ कि जिस व्यक्ति से वह बात कर रहा है, वह असल में कंपनी का फर्जी अधिकारी बनकर बैठा एक अपराधी है। महाप्रबंधक ने उच्च अधिकारी का निर्देश समझकर विभिन्न बैंक खातों में पैसे भेजना शुरू कर दिया।
साइबर अपराधियों का यह चक्रव्यूह इतना मजबूत था कि कुछ ही समय के भीतर तीन करोड़ बीस लाख रुपये अलग-अलग खातों में स्थानांतरित कर दिए गए। इनमें से एक बड़ा हिस्सा श्याम ट्रेडिंग कंपनी नामक एक फर्म के बैंक खाते में भेजा गया था। जब कंपनी के असली प्रबंधन को इस विशाल लेन-देन की भनक लगी, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। जांच करने पर पता चला कि ऐसा कोई निर्देश कंपनी की तरफ से जारी ही नहीं किया गया था। इसके तुरंत बाद पीड़ित पक्ष ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया।
कोलकाता में एसटीएफ की छापेमारी और शातिर अपराधी की गिरफ्तारी
मामले की गंभीरता और करोड़ों रुपये के गबन की बात सामने आते ही उत्तराखंड एसटीएफ के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक अजय सिंह ने विशेष जांच दल का गठन किया। एसटीएफ की तकनीकी टीम ने तुरंत मामले की जांच शुरू कर दी। बैंक खातों के विवरण, फोन नंबरों की लोकेशन, आईपी एड्रेस और ऑनलाइन लेन-देन के डिजिटल चिह्नों की बारीक जांच की गई। तकनीकी विश्लेषण के साथ-साथ पुलिस टीम ने धरातल पर भी अपने तंत्र को सक्रिय किया।
लगातार कई दिनों की मशक्कत और कड़ी मेहनत के बाद एसटीएफ को एक ठोस सुराग मिला। पुलिस को पता चला कि इस पूरी साजिश का तार पश्चिम बंगाल के कोलकाता शहर से जुड़ा हुआ है। आरोपी कोलकाता के महेशतल्ला क्षेत्र स्थित ग्रीन फील्ड सिटी नामक आवासीय इलाके में छिपा हुआ है। सूचना की पुष्टि होते ही उत्तराखंड एसटीएफ की एक विशेष टीम तुरंत कोलकाता के लिए रवाना कर दी गई।
स्थानीय स्तर पर जरूरी सहायता जुटाने के बाद एसटीएफ ने बताए गए ठिकाने पर अचानक छापेमारी की। पुलिस ने मौके से आरोपी को दबोच लिया, जिसकी पहचान चंद्रकांत मिश्रा के रूप में हुई। चंद्रकांत मिश्रा लंबे समय से इस ठगी के मामले में फरार चल रहा था और पुलिस की नजरों से बचने के लिए कोलकाता में छुपा हुआ था। एसटीएफ की इस त्वरित और सटीक कार्रवाई से साइबर अपराधियों के गिरोह को बहुत बड़ा झटका लगा है।
आरोपी के पास से बरामद इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और महत्वपूर्ण दस्तावेज
गिरफ्तार किए गए अभियुक्त चंद्रकांत मिश्रा के पास से एसटीएफ ने भारी मात्रा में डिजिटल सबूत और संदिग्ध सामग्री जब्त की है।
पुलिस की छापेमारी के दौरान आरोपी के कब्जे से निम्नलिखित महत्वपूर्ण वस्तुएं बरामद की गईं:
दो अत्याधुनिक स्मार्टफोन, जिनका इस्तेमाल संभावित रूप से फर्जी खातों और व्हाट्सएप खातों को संचालित करने के लिए किया जाता था।
चार सक्रिय मोबाइल सिम कार्ड, जो अलग-अलग नाम और पते पर जारी कराए गए थे।
एक उच्च क्षमता वाला लैपटॉप, जिसका प्रयोग फर्जी दस्तावेज तैयार करने और वित्तीय लेन-देन पर नजर रखने के लिए किया जा रहा था।
जब एसटीएफ की टीम ने बरामद लैपटॉप की प्राथमिक जांच की, तो उसमें से कई चौंकाने वाले खुलासे हुए। लैपटॉप के भीतर विभिन्न व्यावसायिक कंपनियों और निजी संस्थाओं के डिजिटल दस्तावेज मिले, जिन्हें आसानी से बदला जा सकता था। इसके अलावा विभिन्न बैंकों के लोन आवेदन पत्र, कई अज्ञात व्यक्तियों के पहचान पत्र और पैन कार्ड की प्रतियां भी भारी संख्या में पाई गईं।
इन दस्तावेजों की मौजूदगी से पुलिस का अंदेशा और गहरा गया है। ऐसा माना जा रहा है कि आरोपी और उसका गिरोह आम नागरिकों और कंपनियों के पहचान पत्रों का गलत इस्तेमाल करके फर्जी बैंक खाते खोलता था। इन्हीं खातों का उपयोग ठगी की रकम को इधर-उधर करने और सफेद बनाने में किया जाता था। फिलहाल पुलिस ने बरामद लैपटॉप और मोबाइल फोनों को फारेंसिक जांच के लिए प्रयोगशाला भेज दिया है, ताकि मिटाए गए डेटा और छिपी हुई जानकारियों को बाहर निकाला जा सके।
साइबर अपराध नेटवर्क पर एसटीएफ की कार्रवाई और पूर्व में हुई गिरफ्तारियां
यह तीन करोड़ बीस लाख रुपये की धोखाधड़ी केवल एक व्यक्ति का काम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सुसंगठित और पेशेवर साइबर अपराधियों का नेटवर्क काम कर रहा था। एसटीएफ की जांच में यह बात पहले ही साफ हो चुकी थी कि इस गिरोह के तार देश के कई राज्यों में फैले हुए हैं।
इस मामले में उत्तराखंड पुलिस और एसटीएफ पहले भी बड़ी सफलता हासिल कर चुकी है। चंद्रकांत मिश्रा की गिरफ्तारी से पूर्व एसटीएफ इस प्रकरण में तीन अन्य शातिर आरोपियों को गिरफ्तार करके जेल भेज चुकी है। उन तीनों आरोपियों के खिलाफ पुलिस ने पर्याप्त सबूत जुटाकर अदालत में आरोप-पत्र भी दाखिल कर दिया है।
चंद्रकांत मिश्रा इस पूरे खेल की एक मुख्य कड़ी था, जो बैंक खातों का प्रबंध करने और फर्जी डिजिटल पहचान बनाने में माहिर था। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि मिश्रा की गिरफ्तारी से इस नेटवर्क के कई और राज बाहर आने की उम्मीद है। पुलिस अब उससे यह पूछताछ कर रही है कि ठगी की गई ₹3.20 करोड़ की विशाल राशि में से किसे कितना हिस्सा मिला और उस रकम को कहां-कहां निवेश किया गया या छुपाया गया है।
डिजिटल युग में कॉर्पोरेट ठगी का नया तरीका और सावधानियां
हाल के दिनों में जिस तरह से कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों के नाम पर धोखाधड़ी के मामले बढ़े हैं, वह बेहद चिंताजनक है। इस प्रकार की ठगी को सुरक्षा की भाषा में मुख्य कार्यकारी अधिकारी धोखाधड़ी या डिजिटल पहचान का छद्म रूप कहा जाता है। इसमें अपराधी किसी कंपनी के मालिक, निदेशक या वरिष्ठ अधिकारी की फर्जी प्रोफाइल बनाते हैं और नीचे काम करने वाले कर्मचारियों को जरूरी काम या आपातकालीन भुगतान का बहाना बनाकर पैसे भेजने का निर्देश देते हैं।
उत्तराखंड एसटीएफ ने इस घटना के बाद आम जनता, व्यापारियों और विभिन्न संस्थाओं के अधिकारियों को सतर्क रहने की सलाह दी है। किसी भी बड़े वित्तीय लेन-देन से पहले हमेशा दोहरे सत्यापन की प्रक्रिया को अपनाना चाहिए। यदि किसी वरिष्ठ अधिकारी का अचानक व्हाट्सएप या किसी अन्य मैसेजिंग ऐप पर पैसे ट्रांसफर करने का संदेश आए, तो केवल संदेश पर भरोसा न करें। तुरंत उस अधिकारी को सीधे फोन करके बात करें और भुगतान की पुष्टि करें।
साथ ही, किसी भी अज्ञात या अप्रमाणित संस्था के बैंक खाते में बड़ी रकम ट्रांसफर करने से बचना चाहिए। यदि किसी कारणवश कोई व्यक्ति या संस्था साइबर ठगी का शिकार हो जाती है, तो बिना समय गंवाए तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन पर संपर्क करना चाहिए या नजदीकी साइबर पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराना चाहिए। शुरुआती कुछ घंटों में शिकायत दर्ज होने पर ठगी गई रकम को बैंक खातों में ही रोके जाने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
मामले की आगे की जांच और एसटीएफ का रुख
एसएसपी अजय सिंह के मार्गदर्शन में एसटीएफ की टीम अब गिरफ्तार आरोपी चंद्रकांत मिश्रा से गहन पूछताछ कर रही है। पुलिस यह जानने का प्रयास कर रही है कि इस फर्जीवाड़े में और कौन-कौन से सफेदपोश या तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं। फर्जी बैंक खाते खोलने में किन-किन बैंक कर्मचारियों या एजेंटों की भूमिका रही है, इसकी भी जांच की जा रही है।
एसटीएफ अधिकारियों का स्पष्ट कहना है कि राज्य में साइबर अपराध को अंजाम देने वाले किसी भी अपराधी को बख्शा नहीं जाएगा। चाहे अपराधी देश के किसी भी हिस्से में बैठा हो, एसटीएफ की नजर हर संदिग्ध गतिविधि पर बनी हुई है। आने वाले दिनों में इस मामले में कुछ और चौंकाने वाले खुलासे होने की उम्मीद है, जिससे साइबर अपराधियों के इस बड़े गिरोह का पूरी तरह से सफाया किया जा सके।


