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किसी भी सूरत में नहीं होगा सुशासन से समझौता: लोक भवन की समीक्षा बैठक में बोले राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवैधानिक संस्थाएं केवल ईंट-पत्थरों की इमारतें या प्रशासनिक कार्यालय मात्र नहीं होतीं, बल्कि वे उस राज्य की जनता के विश्वास, अधिकारों और लोकतांत्रिक मूल्यों की जीवंत प्रतीक होती हैं। इन संस्थाओं की कार्यप्रणाली और उनकी कार्यशैली सीधे तौर पर यह तय करती है कि शासन व्यवस्था जनता के प्रति कितनी संवेदनशील, पारदर्शी और जवाबदेह है। हाल ही में राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन द्वारा लोक भवन के अधिकारियों के साथ की गई उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक और विभिन्न विभागों के औचक निरीक्षण ने इस बात को फिर से रेखांकित किया है कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के लिए जनहित और प्रशासनिक पारदर्शिता सर्वोपरि होनी चाहिए। यह बैठक महज एक औपचारिक प्रशासनिक संवाद नहीं थी, बल्कि यह लोक सेवा के मूल्यों को नए सिरे से परिभाषित करने और शासन की सुस्त पड़ती रफ्तार को गति देने का एक गंभीर और दूरदर्शी प्रयास था। इस आलेख में हम इसी घटना के बहाने संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक सुधारों की आवश्यकता, जनता और शासन के बीच सेतु निर्माण तथा सुशासन के विभिन्न आयामों पर विस्तार से चर्चा करेंगे।

संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और लोक भवन की महत्ता
लोक भवन राज्य का सर्वोच्च और सबसे प्रतिष्ठित संवैधानिक केंद्र होता है। यहां से निकलने वाले हर एक आदेश, नीति और निर्णय का सीधा असर प्रदेश की जनता और उसकी प्रशासनिक व्यवस्था पर पड़ता है। ऐसे में यह अत्यंत आवश्यक हो जाता है कि इस संस्था की गरिमा, मर्यादा और प्रतिष्ठा हमेशा सर्वोच्च बनी रहे। जब राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन ने अधिकारियों के साथ बैठक कर यह स्पष्ट किया कि लोक भवन की गरिमा को बनाए रखना और इसे जनता की भावनाओं के अनुरूप अधिक जनसुलभ बनाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है, तो उन्होंने असल में लोकतंत्र की मूल भावना को ही आवाज दी है।

ऐतिहासिक रूप से भी यदि हम नजर डालें, तो हमारे देश में शासन का आधार हमेशा जन कल्याण और लोक सेवा रहा है। आधुनिक प्रशासनिक व्यवस्था में जब नौकरशाही और जनता के बीच की दूरी बढ़ने का अंदेशा होता है, तब ऐसे उच्च स्तरीय हस्तक्षेप यह सुनिश्चित करते हैं कि सत्ता का केंद्र जनता से कटा हुआ महसूस न करे। लोक भवन सचिवालय की कार्यप्रणाली की यह समीक्षा इस बात का प्रमाण है कि संवैधानिक मुखिया अपनी जिम्मेदारी के प्रति पूरी तरह सतर्क और सजग हैं।

प्रशासनिक पारदर्शिता और समयबद्धता: सुशासन की अनिवार्य शर्त
किसी भी सरकारी कार्यालय या सचिवालय में फाइलों का उठना और गिरना एक सामान्य प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन जब यही फाइलें लाल फीताशाही के जाल में फंस जाती हैं, तो जनता के सपने और अधिकार दोनों दम तोड़ने लगते हैं।

राज्यपाल ने बैठक के दौरान इस बात पर विशेष जोर दिया कि किसी भी पत्रावली को अनावश्यक रूप से लंबित न रखा जाए और प्रत्येक प्रकरण का निस्तारण निर्धारित समयसीमा के भीतर ही सुनिश्चित किया जाए।

लाल फीताशाही पर लगाम: प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी अक्सर भ्रष्टाचार और जनता में अविश्वास का सबसे बड़ा कारण बनती है। फाइलों के अनावश्यक रूप से रुकने से न केवल सरकारी योजनाओं की रफ्तार धीमी होती है, बल्कि आम नागरिकों का मनोबल भी टूटता है।

समयबद्ध निस्तारण: जब हर काम के लिए एक निश्चित समयसीमा तय कर दी जाती है और उसकी नियमित मॉनिटरिंग होती है, तो पूरी व्यवस्था में एक सकारात्मक दबाव बनता है। इससे अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है और काम में तेजी आती है।

डिजिटल और पारदर्शी प्रणाली: आधुनिक दौर में फाइलों के निपटारे को पारदर्शी बनाने के लिए डिजिटल तकनीकों का उपयोग और कड़ाई से निगरानी बेहद जरूरी है, जिससे यह पता चल सके कि किस पत्रावली पर किस स्तर पर निर्णय लिया जा रहा है।

जनता की पहुंच और सम्मानजनक व्यवहार: लोकतंत्र की असली कसौटी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें शासन का हर अंग अंततः जनता के प्रति उत्तरदायी होता है। लोक भवन जैसे उच्च संस्थानों में जब आम नागरिक अपनी समस्याएं लेकर पहुंचते हैं, तो उनके साथ किया जाने वाला व्यवहार और उनकी बात सुने जाने का तरीका यह तय करता है कि शासन प्रणाली कितनी मानवीय है।

राज्यपाल ने स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि लोक भवन आने वाले प्रत्येक नागरिक को सहज पहुंच, सम्मानजनक व्यवहार और अपनी बात रखने का उचित अवसर मिलना चाहिए। कई बार ऐसा देखा जाता है कि सामान्य नागरिक सरकारी कार्यालयों के बड़े दरवाजों और जटिल औपचारिकताओं के सामने खुद को असहज महसूस करते हैं। ऐसे में यदि कर्मचारी और अधिकारी संवेदनशीलता का परिचय देते हुए नागरिकों का स्वागत करें और उनकी समस्याओं को धैर्यपूर्वक सुनें, तो शासन के प्रति आम जनता का विश्वास कई गुना बढ़ जाता है। संवेदनशीलता, पारदर्शिता और तत्परता – ये तीन ऐसे स्तंभ हैं जिनके बिना किसी भी जनहितकारी प्रशासन की कल्पना नहीं की जा सकती है।

पुस्तकालय और अनुभागों का निरीक्षण:
समीक्षा बैठक के बाद राज्यपाल द्वारा लोक भवन के विभिन्न अनुभागों का औचक निरीक्षण और वहां की व्यवस्थाओं का जायजा लेना इस बात को दर्शाता है कि प्रशासनिक कसावट केवल कागजी बैठकों से नहीं आती, बल्कि मैदानी और जमीनी हकीकत का जायजा लेने से आती है। प्रत्येक अनुभाग की कार्यशैली को नजदीक से देखना और वहां काम करने वाले कर्मचारियों की कठिनाइयों को समझना एक सच्चे नेतृत्व की निशानी है।

इसके साथ ही, लोक भवन पुस्तकालय का भ्रमण करना और वहां उपलब्ध सुविधाओं की जानकारी लेना इस बात का संकेत है कि प्रशासनिक दक्षता के साथ-साथ बौद्धिक विकास और पठन-पाठन की संस्कृति को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए। एक अच्छा सचिवालय वही माना जाता है जहां के अधिकारी और कर्मचारी केवल आदेशों का पालन करने वाले यंत्र न हों, बल्कि वे नीतिगत मामलों की गहरी समझ रखते हों, जिसके लिए एक समृद्ध पुस्तकालय और ज्ञानार्जन का माहौल बहुत महत्वपूर्ण होता है।

भविष्य की दिशा: एक अधिक उत्तरदायी और सुलभ सचिवालय का निर्माण
राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन द्वारा दिए गए निर्देश और लोक भवन सचिवालय में की गई यह समीक्षा बैठक आने वाले समय में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है।

यदि इन दिशा-निर्देशों को पूरी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के साथ अमलीजामा पहनाया जाए, तो इसके निम्नलिखित दूरगामी सकारात्मक परिणाम देखने को मिलेंगे:
जनता और शासन के बीच की दूरी का कम होना: जब आम आदमी को यह विश्वास हो जाएगा कि उसकी बात सीधे और बिना किसी बाधा के सुनी जा रही है, तो व्यवस्था के प्रति उसका लगाव और भरोसा मजबूत होगा।

कार्यसंस्कृति में सकारात्मक बदलाव: अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच समर्पण और मनोयोग से काम करने की भावना जागृत होने से संपूर्ण प्रशासनिक ढांचे की कार्यक्षमता में भारी सुधार आएगा।

भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश: पारदर्शिता और तय समयसीमा में कार्यों के निष्पादन से भ्रष्टाचार के अवसरों में अपने आप कमी आएगी और सिस्टम अधिक क्लीन तथा फास्ट बनेगा।

संवैधानिक संस्थाओं की साख में वृद्धि: जब राज्य के सर्वोच्च संस्थान जनहित के प्रति सबसे आगे खड़े नजर आएंगे, तो अन्य विभागों के लिए भी एक बेहतरीन मिसाल कायम होगी।

लोक भवन की यह समीक्षा बैठक मात्र एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह इस बात का पुनरावलोकन था कि लोकतंत्र में जनसेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। राज्यपाल डॉ. ढाल सिंह बिसेन का यह संदेश स्पष्ट है कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से लेकर अंतिम पायदान पर काम करने वाले कर्मचारी तक, हर किसी का एकमात्र उद्देश्य जनता के जीवन को सुगम बनाना और शासन को अधिक से अधिक पारदर्शी तथा जवाबदेह बनाना होना चाहिए। यदि इसी भावना के साथ निरंतर कार्य किया जाता रहा, तो न केवल लोक भवन की गरिमा और प्रतिष्ठा में और अधिक वृद्धि होगी, बल्कि प्रदेश का प्रत्येक नागरिक खुद को इस विकास यात्रा का एक महत्वपूर्ण और सम्मानित हिस्सा महसूस करेगा।

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