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मेहनत की मिसाल: सुलतानपुर के पूर्णेन्दु सिंह बने आईपीएस, बचपन से संघर्ष और ईमानदारी ने दिलाया सफलता का ताज

मेहनत की मिसाल। कभी छोटे शहर की गलियों में अनुशासन और ईमानदारी को जीवन का मंत्र मानने वाले पूर्णेन्दु सिंह आज भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के चमकते सितारे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस सेवा (PPS) के वर्ष 2000 बैच से अपने करियर की शुरुआत करने वाले इस सुलतानपुर निवासी अधिकारी ने दो दशक से अधिक समय तक अपनी निष्ठा, समर्पण और जनसेवा से पुलिस विभाग में एक अलग पहचान बनाई है।

बचपन से ही पढ़ाई में मेधावी रहे पूर्णेन्दु सिंह ने केन्द्रीय विद्यालय से अपने एजुकेशनल कैरियर को शुरू करते हुए काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU), वाराणसी से समाजशास्त्र में गोल्ड मेडल प्राप्त किया। समाज की समस्याओं और मानवीय संवेदनाओं को समझने की उनकी गहराई ने उन्हें एक संवेदनशील और जननिष्ठ पुलिस अधिकारी बनाया।
अपने सेवाकाल में उन्होंने प्रतापगढ़, गोंडा, फतेहपुर, कौशांबी, फिरोजाबाद, मऊ, बाराबंकी और लखनऊ जैसे कई जनपदों में पुलिस क्षेत्राधिकारी (CO), पुलिस उपाधीक्षक और यातायात प्रभारी के रूप में कार्य किया। भीड़ नियंत्रण और यातायात प्रबंधन में उनकी विशेषज्ञता ने उन्हें प्रदेश के सबसे भरोसेमंद अधिकारियों में शामिल किया।

लखनऊ में एसपी ट्रैफिक और एडीसीपी ट्रैफिक के रूप में उन्होंने न केवल कानून व्यवस्था को सुदृढ़ किया बल्कि कम्युनिटी पुलिसिंग को नई दिशा दी। उन्होंने सड़क सुरक्षा को जन आंदोलन बनाने का बीड़ा उठाया और लगभग 350 विद्यालयों में जाकर बच्चों को यातायात नियमों की जानकारी दी। खेलों में भी वे हमेशा से अग्रणी रहे – प्रयागराज और आगरा पुलिस जोन की फुटबॉल टीम के कप्तान रहे और लगातार पांच वर्षों तक गणतंत्र दिवस परेड के कमांडर बने।

उनकी ईमानदारी और अनुशासन ने उन्हें कई सम्मान दिलाए – प्रधानमंत्री प्रशंसा पत्र, केंद्रीय गृह मंत्री का श्रेष्ठ विवेकानंद दशता पदक, मुख्यमंत्री का क्वीन सेवा पदक, तथा पुलिस महानिदेशक की रत्न, स्वर्ण और प्लेटिनम कमेंडेशन डिस्क
पूर्णेन्दु सिंह ने अब तक 12 बार स्वैच्छिक रक्तदान कर समाजसेवा की मिसाल कायम की है। उनकी सफलता इस बात का प्रमाण है कि सपने वही पूरे होते हैं जिनमें मेहनत और निष्ठा की ताकत होती है।

पूर्णेन्दु सिंह की कहानी सिर्फ एक अधिकारी की नहीं, बल्कि उस बच्चे की है जिसने बचपन से ही अनुशासन, मेहनत और ईमानदारी को अपना धर्म बनाया। आज उनकी उपलब्धि सुलतानपुर ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश के लिए गर्व का विषय है।

मुझे फख्र है देश के इस सच्चे सपूत पर – जो खुशकिस्मती से मेरे प्रिय मित्र भी हैं और तभी शायद मैं आपको उनकी जिंदगी का फलसफा इतने करीब से बयां कर पा रहा हूँ।

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