वन भूमि हस्तांतरण मामलों में तेजी लाने के लिए उत्तराखंड सरकार ने एक बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। राज्य में विकास कार्यों, विशेषकर सड़क कनेक्टिविटी को रफ्तार देने के उद्देश्य से लोक निर्माण विभाग (लोनिवि) के मंत्री सतपाल महाराज ने कड़ा रुख अपनाया है। देहरादून स्थित यमुना कॉलोनी के विभागीय सभागार में आयोजित एक उच्च स्तरीय समीक्षा बैठक में उन्होंने लोक निर्माण विभाग और वन विभाग के अधिकारियों को स्पष्ट हिदायत दी कि विकास योजनाओं की राह में आ रही प्रशासनिक बाधाओं को तुरंत दूर किया जाए। सरकार का मुख्य ध्यान इस समय उन सड़कों को जल्द से जल्द धरातल पर उतारने पर है जो केवल कागजी औपचारिकताओं और वन विभाग की आपत्तियों के कारण अटकी हुई हैं।
बैठक के दौरान मंत्री ने लोक निर्माण विभाग और वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के पेंच कसे। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जनता से जुड़े इन महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचागत प्रोजेक्ट्स में किसी भी स्तर पर ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। भौगोलिक रूप से चुनौतीपूर्ण इस पर्वतीय राज्य में सड़कें ही जीवन रेखा हैं, इसलिए वन भूमि से जुड़ी अनापत्ति प्रमाणपत्रों (एनओसी) और भूमि हस्तांतरण की फाइलों का निस्तारण एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा होना चाहिए।
वन भूमि हस्तांतरण में देरी से प्रभावित हैं सैकड़ों परियोजनाएं
समीक्षा बैठक के दौरान जो आंकड़े सामने आए, वे राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास की धीमी गति को दर्शाते हैं। लोक निर्माण मंत्री सतपाल महाराज ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि प्रदेश के विभिन्न जनपदों में सैकड़ों ऐसी सड़कें हैं जिन्हें तकनीकी और सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन वन भूमि के हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी न होने के कारण धरातल पर वास्तविक निर्माण कार्य शुरू नहीं हो पा रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, उत्तराखंड के लगभग सभी प्रमुख जिलों में यह समस्या बनी हुई है। इनमें कुमाऊं और गढ़वाल दोनों मंडलों के जिले शामिल हैं, जहां सामरिक और स्थानीय महत्व की सड़कों का काम अटका पड़ा है। इन जिलों की सूची इस प्रकार है:
अल्मोड़ा
बागेश्वर
नैनीताल
पिथौरागढ़
चंपावत
उधम सिंह नगर
उत्तरकाशी
चमोली
रुद्रप्रयाग
टिहरी
देहरादून
पौड़ी
इन 12 जिलों में सड़कों की स्थिति और उनके लंबित होने के कारणों का वर्गीकरण किया गया है, जिससे समस्या की गंभीरता का पता चलता है।
लोक निर्माण विभाग के अलग-अलग वृत्तों में लंबित मामलों का विवरण निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित है:
1.विधिवत स्वीकृति प्राप्त मामले: कुल 312 ऐसी परियोजनाएं हैं जिन्हें उच्च स्तर से विधिवत मंजूरी मिल चुकी है, लेकिन वन विभाग की अंतिम स्वीकृतियों के अभाव में काम रुका है।
2. सैद्धांतिक स्वीकृति प्राप्त मामले: लगभग 327 सड़कें ऐसी हैं जिन्हें प्रारंभिक या सैद्धांतिक मंजूरी मिल चुकी है, परंतु विस्तृत हस्तांतरण प्रक्रिया अभी अधर में है।
3.सैद्धांतिक स्वीकृति की अपेक्षा में लंबित मामले: करीब 347 प्रस्ताव ऐसे हैं जो लंबे समय से सैद्धांतिक मंजूरी मिलने का इंतजार कर रहे हैं।
4. पोर्टल पर अपलोडिंग हेतु लंबित मामले: इसके अतिरिक्त कई ऐसे मामले भी हैं जो तकनीकी औपचारिकताओं और विभागीय पोर्टल पर दस्तावेज अपलोड न होने के कारण फंसे हुए हैं।
इन सभी श्रेणियों को मिलाकर राज्य में कुल 1141 सड़क निर्माण के मामले केवल वन भूमि हस्तांतरण की पेचीदगियों के कारण लंबित चल रहे हैं। इतनी बड़ी संख्या में सड़कों का रुकना राज्य के ग्रामीण और सीमांत क्षेत्रों के विकास के लिए एक बड़ी बाधा बना हुआ है।
अंतर-विभागीय समन्वय और सख्त समय सीमा तय
इस गतिरोध को तोड़ने के लिए कैबिनेट मंत्री ने अधिकारियों को एक कार्य योजना के तहत काम करने का निर्देश दिया है। उन्होंने कहा कि अक्सर यह देखा जाता है कि लोक निर्माण विभाग और वन विभाग के बीच बेहतर तालमेल न होने के कारण फाइलें एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर के चक्कर काटती रहती हैं। इस प्रवृत्ति को खत्म करने के लिए दोनों विभागों के अधिकारियों को संयुक्त रूप से बैठकर आपत्तियों का समाधान खोजना होगा।
बैठक में उपस्थित लोक निर्माण विभाग के सचिव पंकज पांडे और प्रमुख अभियंता राजेश शर्मा को निर्देशित किया गया कि वे हर एक लंबित मामले की साप्ताहिक निगरानी करें। मंत्री ने स्पष्ट किया कि जिन 1141 मामलों की पहचान की गई है, उन्हें प्राथमिकता के आधार पर निपटाया जाए। अधिकारियों को यह भी निर्देश दिए गए कि वे केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित मामलों के लिए आवश्यक पैरवी तेज करें, ताकि राष्ट्रीय सुरक्षा और ग्रामीण कनेक्टिविटी से जुड़े प्रोजेक्ट्स को समय पर पूरा किया जा सके।
उच्च स्तरीय बैठक में शीर्ष अधिकारियों की उपस्थिति
देहरादून में आयोजित इस महत्वपूर्ण समीक्षा बैठक की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें लोक निर्माण विभाग, वन विभाग और सीमा सड़क संगठन के तमाम शीर्ष नीति निर्माता और नीति नियंता मौजूद थे।
बैठक में मुख्य रूप से निम्नलिखित अधिकारी शामिल हुए:
पंकज पांडे (सचिव, लोक निर्माण विभाग)
राजेश शर्मा (प्रमुख अभियंता, लोक निर्माण विभाग)
दयानंद (मुख्य अभियंता)
राजेंद्र स्याना (मुख्य अभियंता)
कल्याणी (अपर सचिव, वन एवं पर्यावरण विभाग)
मीनाक्षी जोशी (नोडल अधिकारी)
इन प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) के वरिष्ठ अधिकारी भी इस संवाद का हिस्सा बने। सीमा सड़क संगठन की उपस्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तराखंड की कई सीमावर्ती सड़कें सामरिक दृष्टिकोण से बेहद संवेदनशील हैं और उनका समय पर बनना देश की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है।
जनहित और राज्य के विकास पर प्रभाव
उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में सड़कों का निर्माण केवल परिवहन का साधन नहीं है, बल्कि यह स्वास्थ्य, शिक्षा और आपातकालीन सेवाओं तक स्थानीय जनता की पहुंच सुनिश्चित करने का एकमात्र माध्यम है। मानसून के दौरान या सर्दियों में सड़कें बंद होने या न होने से ग्रामीणों को भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने कहा कि सरकार का लक्ष्य अंतिम छोर पर बैठे व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना है। यदि वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रियाओं में महीनों का समय लगेगा, तो विकास योजनाओं की लागत भी बढ़ेगी और जनता को उनका लाभ भी समय पर नहीं मिल सकेगा। इसलिए, सभी अधिकारियों को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करते हुए पूरी पारदर्शिता और गति के साथ काम करना होगा।
इस समीक्षा बैठक के बाद अब यह उम्मीद जताई जा रही है कि लोक निर्माण विभाग और वन विभाग के बीच समन्वय बेहतर होगा। मंत्रियों की ओर से मिली इस सख्त हिदायत के बाद दोनों विभागों के तकनीकी अमले को सक्रिय कर दिया गया है ताकि 1141 लंबित परियोजनाओं की फाइलों पर लगी धूल को साफ कर उन्हें जल्द से जल्द धरातल पर क्रियान्वित किया जा सके। आने वाले दिनों में यदि इन मामलों का त्वरित निस्तारण होता है, तो उत्तराखंड के ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में सड़क नेटवर्क को एक नई मजबूती मिलेगी, जिससे न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी गति मिलेगी।


