उत्तराखंड राज्य के पहाड़ी अंचलों से लेकर मैदानी भूभागों तक फैली अत्यंत समृद्ध लोक संस्कृति, पारंपरिक पर्वों और प्रकृति के प्रति अटूट आस्था का पर्व हरेला संपूर्ण प्रदेश में भारी उत्साह के साथ मनाया गया। इस पावन अवसर पर राज्य सरकार के कैबिनेट मंत्री और हरिद्वार जनपद के प्रभारी मंत्री सतपाल महाराज ने हरिद्वार के देवपुरा स्थित नगर वन में आयोजित एक अत्यंत गरिमापूर्ण और भव्य पौधारोपण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रतिभाग किया। वन विभाग द्वारा आयोजित इस विशेष अभियान में उन्होंने न केवल स्वयं पौधारोपण किया, बल्कि वहां उपस्थित विशाल जनसमूह को संबोधित करते हुए पर्यावरण और जल स्रोतों की रक्षा के लिए आजीवन समर्पित रहने का संकल्प भी दिलाया। उत्तराखंड का यह पावन लोक पर्व हमारी उस गौरवशाली संस्कृति का प्रतीक है जो पर्यावरण संरक्षण को किसी आधुनिक विज्ञान की तरह नहीं, बल्कि अपनी जीवन पद्धति और पूजा पद्धति के रूप में सदियों से मानती आ रही है।
प्रभारी मंत्री ने अपने सारगर्भित संबोधन में देवभूमि की पारंपरिक विरासत पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हरेला पर्व केवल एक वार्षिक उत्सव मात्र नहीं है, वरन यह प्रकृति के प्रति हमारी अगाध आस्था, पूर्वजों की दूरदर्शिता और धरा को हरा-भरा रखने के सामूहिक संकल्प का प्रत्यक्ष प्रमाण है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हम एक छोटे से बीज को श्रद्धापूर्वक मिट्टी में बोते हैं, उसकी दिन-रात देखरेख करते हैं और उसे एक विशाल एवं फलदायी वृक्ष का रूप देते हैं, ठीक उसी प्रकार हमें अपने समाज, अपनी लोक संस्कृति और आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य को भी अपने उत्तम विचारों और प्रयासों से सींचना होगा।
राष्ट्रीय अभियानों के साथ लोक परंपराओं का अद्भुत समन्वय
कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज ने देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक आह्वान ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान की सराहना करते हुए इसे उत्तराखंड की इस पावन लोक परंपरा से जोड़ा। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे इस हरित अभियान और उत्तराखंड की प्राचीन हरेला परंपरा का उद्देश्य पूरी तरह से एक समान है। दोनों ही अभियान हमें अपनी जननी और अपनी मातृभूमि के प्रति कृतज्ञ रहने की प्रेरणा देते हैं। यदि हम सब मिलकर इस प्रकार के रचनात्मक कार्यों में अपनी निरंतर और सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करेंगे, तो राज्य को अधिक हरित, समृद्ध और पर्यावरण अनुकूल बनाने के हमारे संकल्प को कोई नहीं रोक सकता।
उन्होंने प्राचीन ग्रंथों का उल्लेख करते हुए इस बात पर जोर दिया कि सनातन संस्कृति में प्रकृति को सदैव पूजनीय माना गया है। हमारे मनीषियों ने वृक्षों, नदियों, पर्वतों और वनों को देवताओं का वास मानकर उनके संरक्षण का विधान किया था। वृक्ष हमें केवल फल-फूल ही नहीं देते, बल्कि वे जीवनदायिनी ऑक्सीजन, शुद्ध पेयजल और भूमि के कटाव को रोकने के लिए अपनी जड़ों से मिट्टी को बांधकर रखते हैं। यदि प्रकृति सुरक्षित और स्वस्थ रहेगी, तभी पृथ्वी पर मानव जीवन की निरंतरता और उसकी समृद्धि सुनिश्चित हो पाएगी।
वैश्विक चुनौतियों के समाधान के रूप में हमारी लोक संस्कृति
आज संपूर्ण विश्व जिस प्रकार के अप्रत्याशित संकटों जैसे अनियंत्रित जलवायु परिवर्तन, बढ़ता हुआ प्रदूषण, भूजल स्तर का गिरना और तीव्र गति से घटते वन क्षेत्रों की भयावह चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनसे निपटने का सीधा मार्ग हमारी लोक संस्कृति में ही निहित है। प्रभारी मंत्री ने सचेत करते हुए कहा कि ये पर्यावरणीय संकट किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं, अपितु यह संपूर्ण मानवता के अस्तित्व के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बन चुके हैं। ऐसे कठिन समय में उत्तराखंड का पारंपरिक हरेला पर्व समूचे विश्व को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करने के लिए एक जन-आंदोलन का अचूक मार्ग दिखाता है।
हरिद्वार जनपद की विशिष्ट भौगोलिक और सांस्कृतिक महत्ता को रेखांकित करते हुए सतपाल महाराज ने कहा कि यह पावन नगरी न केवल देश-विदेश के श्रद्धालुओं और पर्यटकों की आस्था का केंद्र है, बल्कि यह हमारी प्राकृतिक सुंदरता का प्रवेश द्वार भी है। प्रतिवर्ष यहाँ करोड़ों की संख्या में लोग गंगा स्नान और मानसिक शांति के लिए आते हैं। यहाँ आने वाला प्रत्येक आगंतुक यहाँ के स्वच्छ वातावरण, सघन हरियाली और अविरल प्राकृतिक सौंदर्य की अनुभूति अपने साथ लेकर जाना चाहता है। इसलिए, हरिद्वार के प्रत्येक निवासी, सामाजिक संगठनों और प्रशासनिक तंत्र की यह बहुत बड़ी नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है कि वे अपने आस-पास के पर्यावरण को पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त, स्वच्छ और हरा-भरा बनाए रखें।
पर्यावरण संरक्षण को जन-आंदोलन बनाने की पुरजोर वकालत
इस भव्य जनसभा में कैबिनेट मंत्री ने उपस्थित प्रशासनिक अधिकारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, वन कर्मियों और आम जनता से अत्यंत भावुक और व्यावहारिक अपील की। उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक को लगाए जाने वाले एक पौधे को महज मिट्टी में गाड़ दी गई लकड़ी नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसे हमारी आने वाली संतानों के स्वस्थ और सुखी भविष्य की आधारशिला मानना चाहिए। जब तक हम पौधों को अपने परिवार के सदस्य की भांति स्नेह और सुरक्षा प्रदान नहीं करेंगे, तब तक पौधारोपण के आंकड़े केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे।
उन्होंने पूरे समाज का आह्वान करते हुए कहा कि आइए, हम सब मिलकर इस पर्यावरण सुरक्षा मुहिम को एक वृहद जन-आंदोलन का रूप दें। समाज के प्रत्येक परिवार को यह नियम बनाना चाहिए कि वे वर्ष में कम से कम एक बार अपने किसी भी शुभ प्रसंग जैसे जन्मदिवस, वैवाहिक वर्षगांठ या अपने बुजुर्गों की पुण्य स्मृति में एक पौधा अवश्य लगाएं और उसके संरक्षण की पूर्ण जिम्मेदारी लें। जब सरकार की योजनाएं और समाज की सामूहिक इच्छाशक्ति एक साथ मिलकर आगे बढ़ेंगी, तभी हम एक अत्यंत सुंदर, हरित, स्वच्छ और आर्थिक रूप से समृद्ध देवभूमि का स्वप्न साकार कर पाएंगे।
कार्यक्रम में उपस्थित विशिष्ट गणमान्य व्यक्तियों की सहभागिता
हरिद्वार के देवपुरा स्थित इस सुरम्य नगर वन में आयोजित इस भव्य और ऐतिहासिक कार्यक्रम के दौरान क्षेत्र के अनेक वरिष्ठ राजनेता, धार्मिक गुरु और उच्च प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में मुख्य रूप से हरिद्वार की मेयर श्रीमती किरण, राज्य मंत्री डॉ. जयपाल चौहान, ओम प्रकाश तथा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के परम आदरणीय अध्यक्ष श्रीमहंत रवींद्र पुरी महाराज ने भी विशेष रूप से प्रतिभाग किया। पूज्य संतों की उपस्थिति ने इस पर्यावरण यज्ञ को और अधिक आध्यात्मिक स्वरूप प्रदान किया।
इसके अतिरिक्त प्रशासनिक स्तर पर गढ़वाल कमिश्नर आनंद स्वरूप, हरिद्वार के जिलाधिकारी मयूर दीक्षित, प्रभागीय वनाधिकारी अनिरुद्ध, अपर जिलाधिकारी जितेंद्र, भारतीय जनता पार्टी के जिलाध्यक्ष आशुतोष शर्मा, जिला उपाध्यक्ष लव शर्मा, आशु चौधरी, भारतीय जनता पार्टी युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष विक्रम खुल्ला, जगदीश लाल पाहवा और प्रमोद शर्मा सहित अनेक गणमान्य नागरिकों, पर्यावरणविदों और वन विभाग के कर्मचारियों ने भी इस पुनीत कार्य में सम्मिलित होकर सघन पौधारोपण किया। सभी उपस्थित जनों ने हाथ उठाकर प्रतिज्ञा की कि वे उत्तराखंड की इस गौरवमयी हरियाली को अक्षुण्ण रखने के लिए निरंतर अपना योगदान देते रहेंगे।
सुदृढ़ भविष्य की रूपरेखा
हरिद्वार के इस ऐतिहासिक नगर वन में संपन्न हुआ यह कार्यक्रम केवल सरकारी औपचारिकता भर नहीं था, बल्कि यह प्रकृति के प्रति मानव की अटूट निष्ठा का एक जीवंत दस्तावेज बनकर उभरा। सतपाल महाराज के नेतृत्व में लिए गए इस सामूहिक संकल्प ने यह सिद्ध कर दिया है कि देवभूमि के लोग अपनी पारंपरिक विरासत को संरक्षित करते हुए आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
आगामी समय में इस अभियान के दूरगामी प्रभाव धरातल पर दिखाई देंगे, जब ये नन्हें पौधे बड़े होकर हरिद्वार की आबोहवा को और अधिक शुद्ध और सुंदर बनाएंगे। उत्तराखंड का यह हरित संकल्प न केवल इस पर्वतीय राज्य को सुरक्षित रखेगा, बल्कि संपूर्ण देश को यह प्रेरणा भी देगा कि किस प्रकार हम अपनी लोक संस्कृति के माध्यम से वैश्विक संकटों का समाधान स्थानीय स्तर पर अत्यंत सरलता से कर सकते हैं।


