देहरादून-ऋषिकेश फोरलेन तथा सिक्सलेन चौड़ीकरण परियोजना को लेकर उत्तराखंड की राजनीति और सामाजिक गलियारों में चल रहे अभूतपूर्व गतिरोध के बीच राज्य सरकार ने एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक निर्णय लिया है। सूबे के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस बहुप्रतीक्षित राजमार्ग अवसंरचना परियोजना के अंतर्गत प्रस्तावित हजारों पेड़ों की कटाई पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है। मुख्यमंत्री ने अत्यंत स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में घोषणा की है कि जब तक इस परियोजना से जुड़े सभी पक्षों, पर्यावरणविदों, स्थानीय नागरिकों और हितधारकों के साथ एक संतोषजनक सहमति और आपसी विश्वास का माहौल नहीं बन जाता, तब तक वनों के कटान की प्रक्रिया पूरी तरह से स्थगित रहेगी। इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि देवभूमि का प्रशासनिक तंत्र विकास की अंधी दौड़ के बजाय पर्यावरण संरक्षण और जनभावनाओं के समन्वय को प्राथमिकता देने के मार्ग पर अग्रसर है।
इस बड़े फैसले की अधिकारिक घोषणा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपने सोशल मीडिया हैंडल के माध्यम से देश और प्रदेश की जनता के सामने रखी। उन्होंने अपने सार्वजनिक वक्तव्य में कहा कि राजधानी देहरादून को योग नगरी ऋषिकेश से जोड़ने वाले इस मार्ग के आधुनिकीकरण को लेकर पिछले कई दिनों से स्थानीय निवासियों, पर्यावरण प्रेमियों और जागरूक नागरिकों द्वारा लगातार चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं। मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि लोकतंत्र में जनता की आवाज सर्वोपरि है, इसलिए उन्होंने इन सभी सुझावों और आपत्तियों का अत्यंत गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ संज्ञान लिया है। सरकार का यह कदम यह साबित करता है कि जनता के शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों और पर्यावरण के प्रति उनकी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
वैधानिक स्वीकृतियों के बावजूद जनहित में लिया गया पीछे हटने का फैसला
मुख्यमंत्री ने इस परियोजना की तकनीकी और वैधानिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट करते हुए बताया कि देहरादून-ऋषिकेश मार्ग को चार और छह लेन में परिवर्तित करने की यह योजना भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी अवसंरचना परियोजना है। इस परियोजना पर काम शुरू करने से पहले माननीय उच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का पूरी तरह से पालन किया गया था। इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकार के स्तर पर जितने भी आवश्यक वैधानिक और पर्यावरणीय अनापत्ति प्रमाण पत्र होते हैं, उन सभी प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद ही इस दिशा में कदम आगे बढ़ाए गए थे। कानूनी और तकनीकी रूप से सुदृढ़ होने के बावजूद, सरकार ने केवल जनभावनाओं के आदर के लिए इस पर रोक लगाने का साहसिक निर्णय लिया है।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से इस परियोजना की रूपरेखा इस तरह तैयार की गई थी कि इससे स्थानीय पर्यावरण को कम से कम नुकसान पहुंचे। परंतु, धरातल पर बड़े पैमाने पर होने वाले वृक्षों के पातन को लेकर आम जनता के मन में एक गहरा असंतोष और भय व्याप्त था। स्थानीय लोगों का मानना था कि यदि इतनी बड़ी संख्या में हरे-भरे पेड़ों को काट दिया गया, तो दून घाटी और ऋषिकेश के तापमान और पर्यावरण पर इसका बेहद प्रतिकूल और विनाशकारी प्रभाव पड़ेगा। इस जन आक्रोश को समय रहते भांपते हुए मुख्यमंत्री ने विकास के पहिये को कुछ समय के लिए रोककर संवाद का रास्ता चुनना अधिक श्रेयस्कर समझा।
वन्यजीवों के संरक्षण के लिए परियोजना में किए गए थे विशेष प्रावधान
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस बात को भी प्रमुखता से रेखांकित किया कि इस राजमार्ग चौड़ीकरण परियोजना की कार्ययोजना में पारिस्थितिकी तंत्र और वन्यजीवों की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा गया था। चूंकि यह पूरा मार्ग राजाजी राष्ट्रीय उद्यान और महत्वपूर्ण वन्यजीव गलियारों के समीप से होकर गुजरता है, इसलिए मानव-वन्यजीव संघर्ष को न्यूनतम करने के लिए इसमें कई आधुनिक तकनीकें शामिल की गई थीं। इस परियोजना के अंतर्गत लगभग साढ़े तीन किलोमीटर लंबा एक विशेष हाथी अंडरपास बनाया जाना प्रस्तावित है, ताकि हाथियों का झुंड बिना किसी दुर्घटना के खतरे के राष्ट्रीय राजमार्ग के नीचे से सुरक्षित आवागमन कर सके।
इसके अतिरिक्त, छोटे वन्यजीवों जैसे हिरण, गुलदार और अन्य सरीसृपों के सुरक्षित मार्ग के लिए सड़क के नीचे विशेष कल्वर्ट और छोटे रास्तों की व्यवस्था का भी प्रावधान किया गया है। वर्तमान समय में इस मार्ग पर वाहनों की भारी आवाजाही के कारण आए दिन वन्यजीवों की सड़क दुर्घटनाओं में दर्दनाक मृत्यु हो जाती है, जो पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से एक बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। सरकार का तर्क है कि इस फोरलेन और सिक्सलेन परियोजना के पूरा होने से जहाँ एक तरफ सड़क दुर्घटनाओं में भारी कमी आएगी, वहीं दूसरी तरफ वन्यजीवों को भी एक सुरक्षित गलियारा मिल सकेगा।
विकास और पर्यावरण के संतुलन पर सरकार का नीतिगत दृष्टिकोण
मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में सरकार की प्राथमिकताओं को बहुत ही तार्किक ढंग से स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे भौगोलिक रूप से संवेदनशील पर्वतीय राज्य के लिए बुनियादी ढांचे का विकास बेहद आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना पर्यटन, रोजगार और आर्थिक समृद्धि की कल्पना नहीं की जा सकती। परंतु, इस विकास की कीमत देवभूमि की अमूल्य प्राकृतिक संपदा, जनभावनाओं और स्थानीय नागरिकों के हितों की अनदेखी करके कतई नहीं चुकाई जा सकती। विकास ऐसा होना चाहिए जो हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित रखे, न कि उसे खतरे में डाले।
इसी दूरदर्शी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मुख्यमंत्री ने राज्य के प्रमुख सचिव और लोक निर्माण विभाग तथा वन विभाग के संबंधित उच्चाधिकारियों को कड़े निर्देश जारी किए हैं। उन्होंने अधिकारियों से कहा है कि वे तुरंत सक्रिय होकर इस परियोजना से जुड़े सभी हितधारकों, आंदोलनकारी स्थानीय नागरिकों, क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों और पर्यावरण मामलों के विशेषज्ञों के साथ एक बार फिर से विस्तृत और पारदर्शी संवाद स्थापित करें। सरकार चाहती है कि इस परियोजना के प्रत्येक तकनीकी पहलू को जनता के सामने रखा जाए और उनके मन में व्याप्त सभी संशयों को दूर किया जा किया जा सके।
उच्च न्यायालय के आदेशों का सम्मान और विकल्प रहित संकल्प
उत्तराखंड सरकार ने साफ कर दिया है कि वह इस मामले में माननीय उच्च न्यायालय के प्रत्येक निर्देश और निर्णय का अक्षरशः और पूर्ण सम्मान करते हुए ही आगे की कोई भी कानूनी या प्रशासनिक कार्यवाही करेगी। जब तक वार्ता की मेज पर सभी पक्षों के बीच एक सर्वमान्य और संतोषजनक फार्मूला तैयार नहीं हो जाता, तब तक वन विभाग की आरी इन पेड़ों पर नहीं चलेगी। मुख्यमंत्री ने बहुत ही भावुक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए कहा कि उनके लिए उत्तराखंड की अनुपम प्रकृति, यहाँ के निवासियों की आंतरिक भावनाएं और प्रदेश का समग्र विकास, ये तीनों ही तत्व समान रूप से महत्वपूर्ण हैं और इनमें से किसी एक की भी उपेक्षा नहीं की जा सकती।
सरकार की कार्यप्रणाली अब पूरी तरह से संवाद, आपसी सहमति और व्यापक जनहित के सिद्धांतों पर ही आधारित होगी। इस फैसले से पर्यावरण संरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे संगठनों और स्थानीय लोगों में एक सकारात्मक संदेश गया है। राजनीतिक और प्रशासनिक विश्लेषकों का मानना है कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह निर्णय उनके परिपक्व नेतृत्व को दर्शाता है, जहाँ वे एक तरफ केंद्र सरकार की बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को गति देना चाहते हैं, तो दूसरी तरफ अपनी जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों और देवभूमि के नैसर्गिक सौंदर्य की रक्षा के लिए भी पूरी तरह से प्रतिबद्ध दिखाई देते हैं। अब यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि आने वाले दिनों में प्रशासनिक अधिकारियों और पर्यावरणविदों के बीच होने वाली उच्च-स्तरीय वार्ताओं से इस गतिरोध का क्या व्यावहारिक समाधान निकलकर सामने आता है।


