पत्रकार पायल मेहता का निधन मीडिया जगत के लिए एक ऐसा दुखद और दिल दहला देने वाला वज्रपात है, जिसने देश भर के पत्रकारिता समुदाय, राजनीतिक गलियारों, संसद के सहयोगियों और उनसे जुड़े हर एक व्यक्ति को गहरे शोक में डुबो दिया है। जब यह खबर सामने आई, तो पहली बार में इस पर विश्वास करना किसी के लिए भी संभव नहीं हो पा रहा था। एक ऐसी पत्रकार जो कुछ ही समय पहले तक पूरी ऊर्जा, पेशेवर निष्ठा और मुस्कान के साथ संसद के गलियारों में खबरों की तलाश में डटी हुई थीं, वे इतनी अचानक और इतनी कम उम्र में हम सभी को छोड़कर चली जाएँगी, इसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी। उन्होंने बहुत ही कम उम्र में और बेहद असमय इस दुनिया को अलविदा कह दिया।
संसद की कार्यवाही से लेकर देश के सबसे अहम राजनीतिक घटनाक्रमों को आम जनता तक बेहद सरल, सटीक और पारदर्शी तरीके से पहुँचाने वाली यह कर्मठ और जुझारू पत्रकार अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनके चले जाने से भारतीय मीडिया जगत और विशेष रूप से संसदीय पत्रकारिता के क्षेत्र में जो शून्यता पैदा हुई है, उसकी भरपाई आने वाले लंबे समय तक कर पाना संभव नहीं होगा। संसद की देहरी से उठने वाली उनकी बुलंद आवाज़, उनकी निष्पक्ष और निर्भीक रिपोर्टिंग, कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हुए काम करने का उनका जज्बा और अपने पेशे के प्रति उनका अद्वितीय समर्पण हमेशा-हमेशा के लिए मीडिया जगत के स्वर्णिम इतिहास में दर्ज हो गया है।
संसदीय पत्रकारिता में एक मिसाल था उनका समर्पण और काम का तरीका
संसद की पत्रकारिता को समझना और उसे हर दिन बिना किसी चूक के कवर करना कोई साधारण या आसान काम नहीं होता है। यह मीडिया जगत के सबसे कठिन, जिम्मेदारी भरे और तनावपूर्ण क्षेत्रों में से एक माना जाता है। यहाँ हर बीतते क्षण के साथ राजनीतिक समीकरण बदलते हैं, सदन के भीतर तीखी बहसें होती हैं, नए विधेयक पेश किए जाते हैं और संसद भवन के बाहर व भीतर अनगिनत रणनीतिक गतिविधियाँ चलती रहती हैं। इन सभी घटनाक्रमों पर लगातार सतर्कता के साथ नज़र रखनी होती है। इस बेहद जटिल, संवेदनशील और जिम्मेदारी भरे दायित्व को पत्रकार पायल मेहता ने जिस निष्ठा, असीम धैर्य, अनुशासन और ईमानदारी के साथ निभाया, वह वास्तव में आज के दौर के मीडिया से जुड़े हर युवा पत्रकार और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक महान प्रेरणादायक उदाहरण है।
संसद के सत्र जब भी शुरू होते थे, तो उनकी दिनचर्या आम लोगों की तुलना में बहुत अधिक कठिन और व्यस्त हो जाया करती थी। सुबह जब शहर पूरी तरह से जागा भी नहीं होता था और सूरज ढलने से काफी पहले ही, वे संसद भवन की चौखट पर अपना माइक और डायरी थामे मुस्तैद नज़र आती थीं।
इसके बाद देर रात तक, जब तक कि सदन की कार्यवाही स्थगित नहीं हो जाती थी और दिन भर के तमाम घटनाक्रम पूरी तरह से समाप्त नहीं हो जाते थे, तब तक वे पूरी निष्ठा और तत्परता के साथ मैदान में डटी रहती थीं। किसी भी खबर की तह तक जाना, उसके हर पहलू की गहराई से पड़ताल करना, उसकी प्रामाणिकता और सत्यता को जांचना और फिर पूरी निष्पक्षता के साथ उसे देश की जनता के सामने पेश करना उनकी सबसे बड़ी पेशेवर ताकत थी। उन्होंने कभी भी काम के भारी दबाव, समय की कमी या शारीरिक थकान को अपने चेहरे पर आने नहीं दिया।
संसदीय कार्यवाही के दौरान चलने वाली राजनीतिक खींचतान, संसद में पेश होने वाले जटिल और तकनीकी विधेयकों के मसौदे, और विभिन्न राजनेताओं के बयानों के पीछे छुपे गूढ़ अर्थों को समझकर आम जनता तक बेहद आसान और सरल भाषा में पहुँचाना उनकी एक खास कला थी। जहाँ आज के दौर में सनसनी फैलाने की होड़ मची रहती है, वहीं उन्होंने हमेशा सनसनीखेज मीडिया रिपोर्टिंग से एक सुरक्षित दूरी बनाए रखी और केवल तथ्यों, प्रमाणिकता और नैतिकता पर आधारित पत्रकारिता को ही अपने जीवन की सर्वोच्च प्राथमिकता माना।
पत्रकारिता जगत और राजनीतिक गलियारों में पसरा सन्नाटा
जैसे ही पत्रकार पायल मेहता के अचानक और असमय चले जाने की दुखद सूचना मीडिया और राजनीतिक गलियारों में फैली, चारों तरफ एक गहरा सन्नाटा और शोक छा गया। जिसने भी उनके साथ काम किया था, जिन्होंने संसद के प्रेस गैलरी में उनके साथ समय बिताया था या जो लोग उन्हें दूर से भी केवल उनकी रिपोर्टिंग और टीवी स्क्रीन के जरिए जानते थे, वे सभी इस स्तब्ध कर देने वाली खबर से गहरे सदमे में आ गए।
विभिन्न राजनीतिक दलों के शीर्ष नेताओं, केंद्रीय मंत्रियों, सांसदों, वरिष्ठ संपादकों, साथी पत्रकारों और उनके अनगिनत चाहने वालों ने उन्हें याद करते हुए अपनी गहरी संवेदनाएँ व्यक्त की हैं। संसद के गलियारों में उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर चुके उनके वरिष्ठ सहयोगियों और समकालीनों का कहना है कि वे न केवल अपने काम में एक अत्यंत निपुण और उत्कृष्ट पेशेवर थीं, बल्कि व्यक्तिगत जीवन में भी वे एक बहुत ही सहृदय, दयालु, विनम्र और मिलनसार इंसान थीं।
अथक परिश्रम और अटूट लगन की मिसाल: वे संसद सत्र के दौरान बिना किसी थकान या शिकायत के, लगातार घंटों तक खड़े रहकर निष्पक्ष कवरेज करने के लिए पूरे मीडिया वर्ग में जानी जाती थीं।
तथ्यपरक और जिम्मेदार दृष्टिकोण: किसी भी खबर या सूचना की पूरी तरह से पुष्टि किए बिना, केवल जल्दबाज़ी के चक्कर में वे कभी भी अपनी रिपोर्ट में उसे जगह नहीं देती थीं।
सहज, सरल और सहयोगी स्वभाव: अपने से नए और युवा संवाददाताओं का मार्गदर्शन करने, उन्हें संसदीय नियमों को समझाने और उनकी मदद करने में वे हमेशा आगे रहती थीं।
निडर और निष्पक्ष रिपोर्टिंग शैली: बिना किसी पूर्वाग्रह या राजनीतिक झुकाव के, केवल और केवल सत्य को दर्शकों के सामने रखना ही उनका मुख्य पत्रकारिता सिद्धांत था।
उनके इस प्रकार अचानक और असमय चले जाने से भारतीय मीडिया के उस विचारशील हिस्से को एक बहुत ही भारी और अपूरणीय नुकसान पहुँचा है जो पूरी ईमानदारी, मर्यादा और सत्यता के साथ जन सरोकार की पत्रकारिता पर अटूट यकीन रखता है।
एक कर्मठ व्यक्तित्व और उनके अद्वितीय कार्य की यादें
आज के आधुनिक मीडिया के दौर में अक्सर यह देखा जाता है कि लोग अपनी सुविधा, आराम और समय के हिसाब से काम करना पसंद करते हैं, लेकिन पत्रकार पायल मेहता का व्यक्तित्व और उनका दृष्टिकोण इससे बिल्कुल अलग था। उनके लिए पत्रकारिता केवल एक आजीविका चलाने का साधन, नौकरी या पेशा मात्र नहीं थी, बल्कि यह उनके जीवन का मुख्य उद्देश्य, उनकी पहचान और उनका सबसे बड़ा जुनून था। वे अपने काम को एक पूजा की तरह मानती थीं और उसमें किसी भी प्रकार की लापरवाही उन्हें कतई बर्दाश्त नहीं थी।
वे संसद के हर एक नए सत्र को एक नई जिम्मेदारी, एक नई चुनौती और एक नए अवसर की तरह देखती थीं। मौसम चाहे कैसा भी क्यों न हो, कड़ाके की ठंड की ठिठुरन हो, मूसलाधार बारिश हो या फिर भीषण गर्मी की तपिश, संसद भवन के मुख्य प्रवेश द्वारों पर माइक हाथ में थामे वे हमेशा सबसे अग्रिम पंक्ति में पूरी ऊर्जा के साथ नज़र आती थीं। कई बार जब बजट सत्र या किसी विशेष विधेयक पर रात के समय देर तक बहस चलती थी और अधिकांश लोग थककर अपने घर लौट जाते थे, तब भी वे अपने कैमरे, सहयोगियों और अपनी डायरी के साथ पूरी एकाग्रता और सतर्कता से अपने स्थान पर डटी रहती थीं।
उनकी इस अद्भुत लगन, काम के प्रति निष्ठा और समय की पाबंदी ने न सिर्फ उनके साथी पत्रकारों के बीच बल्कि देश के बड़े-बड़े राजनेताओं, मंत्रियों और संसद के प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी उनके प्रति एक गहरा और आदरणीय सम्मान का भाव पैदा कर दिया था। हर कोई उनकी कार्यशैली, उनके सवाल पूछने के सलीके और उनकी पेशेवर ईमानदारी का दिल से लोहा मानता था। संसदीय पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने अपनी मेहनत के बल पर जो ऊंचा मुकाम हासिल किया था, वह हर किसी के बस की बात नहीं होती।
इस कठिन समय में परिवार और प्रियजनों के प्रति गहरी संवेदनाएं
किसी भी परिवार के लिए अपने किसी हंसते-खेलते, होनहार और प्रिय सदस्य को इतनी कम उम्र में और इस प्रकार अचानक खो देना एक ऐसा असीम दुख है जिसकी तुलना दुनिया की किसी और पीड़ा से नहीं की जा सकती। पत्रकार पायल मेहता के इस तरह अचानक चले जाने से उनके परिवार, रिश्तेदारों और करीबी दोस्तों पर दुखों का जो पहाड़ टूटा है, उसे शब्दों में समेट पाना या व्यक्त कर पाना पूरी तरह से असंभव है। यह एक ऐसी क्षति है जिसे कोई भी शब्द या दिलासा पूरा नहीं कर सकता।
आज इस दुखद घड़ी में संपूर्ण देश का मीडिया जगत, उनके तमाम सहयोगी, राजनीतिक हस्तियाँ, मित्र और उनके पाठक उनके शोकाकुल परिवार के साथ पूरी हमदर्दी से खड़े हैं। हम ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि इस अत्यंत कठिन, दुखद और परीक्षा की घड़ी में उनके परिवार, परिजनों और सभी स्नेहीजनों को यह असीम पीड़ा, भारी दुख और अपूरणीय क्षति सहन करने की आत्मिक शक्ति, साहस और धैर्य प्रदान करे।
पत्रकारिता जगत के लंबे इतिहास में कुछ लोग ऐसे आते हैं जो अपने काम, अपनी सादगी और अपने आचरण से एक ऐसी अमिट छाप और गहरा निशान छोड़ जाते हैं जो समय के साथ कभी धुँधला नहीं होता। पत्रकार पायल मेहता निश्चित रूप से एक ऐसी ही विलक्षण और आदरणीय शख्सियत थीं, जिनकी कमी संसदीय परिसर और संपूर्ण मीडिया जगत में हमेशा-हमेशा महसूस की जाएगी। उनकी अथक मेहनत, उनकी अद्वितीय निष्ठा, उनकी निर्भीक आवाज़ और संसद के गलियारों में उनकी जीवंत उपस्थिति हमेशा याद की जाएगी। उनकी यादें, उनके मूल्य और उनका किया गया काम आने वाली पीढ़ियों के नए पत्रकारों के लिए हमेशा एक मजबूत मार्गदर्शन और प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। ईश्वर उनकी आत्मा को अपने श्रीचरणों में परम शांति प्रदान करे।


