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स्वतंत्रता संग्राम के पाठ से नई पीढ़ी को जोड़ने का संकल्प: चौबट्टाखाल में बोले प्रदेश के कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज

स्वतंत्रता संग्राम के उस दौर में जब पूरा देश ब्रिटिश हुकूमत की गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था, तब समाज के भीतर पनप रही कुरीतियां, भेदभाव और छुआछूत लोगों का जीना मुहाल कर रही थीं। ऐसे कठिन समय में कुछ ऐसी महान विभूतियों ने जन्म लिया जिन्होंने न केवल विदेशी शासकों के खिलाफ मोर्चा खोला, बल्कि अपनी ही धरती के भीतर की उन काली परंपराओं के खिलाफ भी बगावत का बिगुल फूंका जो मानवता के माथे पर कलंक थीं। उत्तराखंड की पावन भूमि पर जन्मे कर्मवीर जयानंद भारती ऐसे ही एक अमर सेनानी, दूरदर्शी समाज सुधारक और जननायक थे, जिन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को समानता, स्वतंत्रता और राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया। उनका जीवन मात्र एक व्यक्ति की गाथा नहीं है, बल्कि वह उस महान संघर्ष का जीवंत दस्तावेज है जिसने पहाड़ी समाज को एक नई दिशा और एक नई चेतना प्रदान की।

उत्तराखंड के सामाजिक परिदृश्य में कर्मवीर जयानंद भारती का अभ्युदय
उत्तराखंड के इतिहास में जब भी सामाजिक न्याय और जन-जागरण की बात होगी, कर्मवीर जयानंद भारती का नाम सबसे आदर के साथ लिया जाएगा। उनके जीवन का सफर संघर्ष, त्याग और अटूट राष्ट्रभक्ति की एक ऐसी मिसाल है जो आज की पीढ़ी को भी गहराई से प्रेरित करती है। जब वे समाज के बीच उतरे, तो उत्तराखंड का पहाड़ी इलाका भीषण सामाजिक विषमताओं से जूझ रहा था। छुआछूत और जातिगत भेदभाव अपनी चरम सीमा पर था। आम इंसान को बुनियादी अधिकार तक नसीब नहीं थे। ऐसे घुटन भरे माहौल में जयानंद भारती ने यह बीड़ा उठाया कि वे समाज के हर उस व्यक्ति को उसका हक दिलाएंगे जो सदियों से उपेक्षित रहा है। उन्होंने शिक्षा को हथियार बनाया और लोगों को जागरूक करना शुरू किया। उनका मानना था कि जब तक समाज अंदर से मजबूत और एकजुट नहीं होगा, तब तक बाहरी स्वतंत्रता का कोई सार्थक अर्थ नहीं हो सकता। यही वजह है कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ सामाजिक सुधारों को अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य बनाया।

ऐतिहासिक डोला-पालकी आंदोलन और समानता की लड़ाई
कर्मवीर जयानंद भारती के सबसे बड़े और ऐतिहासिक योगदानों में से एक ‘डोला-पालकी आंदोलन’ है। उस दौर में समाज के एक बड़े वर्ग को विवाह जैसे पवित्र और खुशी के अवसरों पर भी डोला-पालकी यानी पालकी का उपयोग करने का अधिकार नहीं था। इसे एक विशेषाधिकार माना जाता था जिसे कुछ खास वर्गों तक ही सीमित रखा गया था। यह परंपरा अमानवीय थी और इंसान की गरिमा पर सीधा प्रहार थी। जयानंद भारती ने इस क्रूर और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई। उन्होंने समाज के शोषित और वंचित वर्गों को संगठित किया और उन्हें उनका अधिकार दिलाने के लिए एक बड़ा आंदोलन खड़ा किया।

उनका स्पष्ट दृष्टिकोण था कि इस धरती पर जन्म लेने वाले प्रत्येक मनुष्य को सम्मान के साथ जीने का समान अधिकार है। जाति, वर्ग या सामाजिक स्थिति के आधार पर किसी के भी साथ भेदभाव किया जाना अस्वीकार्य है। डोला-पालकी आंदोलन ने उत्तराखंड की शांत वादियों में एक क्रांतिकारी हलचल पैदा कर दी। रूढ़िवादियों के कड़े विरोध के बावजूद जयानंद भारती पीछे नहीं हटे। उनके इस संघर्ष ने न केवल पीड़ित वर्ग को एक नई ताकत दी, बल्कि समाज के भीतर सदियों से चली आ रही दबे-कुचले लोगों की आवाज को बुलंद कर दिया। यह आंदोलन उत्तराखंड के सामाजिक इतिहास का वह मील का पत्थर साबित हुआ, जिसने जातिगत दीवारों को दरकाने का काम किया।

ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ अदम्य साहस और राष्ट्रभक्ति
जयानंद भारती केवल सामाजिक कुरीतियों के ही विरोधी नहीं थे, बल्कि वे ब्रिटिश साम्राज्य के सबसे निडर और मुखर आलोचकों में से एक थे। उनका राष्ट्रप्रेम किसी से छिपा नहीं था। उनके अदम्य साहस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने संयुक्त प्रांत के गवर्नर और ब्रिटिश अधिकारी लॉर्ड मैलकम हेली के सामने खड़े होकर खुलेआम तिरंगा फहराया था और ‘गो बैक मैलकम हेली’ के जोरदार नारे लगाए थे। उस दौर में एक अंग्रेज अधिकारी के सामने ऐसा करना मौत को गले लगाने जैसा था।

घटना के बाद खुद ब्रिटिश अधिकारी मैलकम हेली ने भी उनके इस साहस और दिलेरी की तारीफ करते हुए कहा था कि यदि जयानंद भारती उस वक्त पिस्तौल निकालकर मुझे मार भी देते, तो भी मैं उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था, क्योंकि उनके भीतर का राष्ट्रप्रेम और हौसला असीम था। यह प्रसंग साबित करता है कि कर्मवीर जयानंद भारती भीतर से कितने फौलादी इरादों वाले इंसान थे। वे अंग्रेजों की दमनात्मक नीतियों से कभी नहीं डरे और हमेशा आगे बढ़कर अपनी मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करते रहे।

स्मृतियों को संजोने और नई पीढ़ी को प्रेरित करने के प्रयास
समय बीतता गया, लेकिन महान विभूतियों के विचार और उनके किए गए कार्य हमेशा इतिहास के पन्नों और लोगों के दिलों में जीवित रहते हैं। हाल ही में स्यूंसी, बीरोंखाल में आयोजित दो दिवसीय राजकीय मेले और कर्मवीर जयानंद भारती की 146वीं जयंती के भव्य आयोजन ने एक बार फिर से उनकी स्मृतियों को ताजा कर दिया है। इस अवसर पर वक्ताओं ने उनके जीवन के हर पहलू पर प्रकाश डाला और बताया कि कैसे उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी समाज के उत्थान के लिए खपा दी।

सरकार और जनप्रतिनिधियों की यह जिम्मेदारी है कि ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानियों और समाज सुधारकों के इतिहास को आने वाली युवा पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। इसी दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए कर्मवीर जयानंद भारती के जीर्ण-क्षीर्ण भवन के जीर्णोद्धार का प्रस्ताव भी रखा गया है, जिस पर शासन स्तर पर सहमति बन चुकी है। यह पहल न केवल उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है, बल्कि यह इस बात का भी प्रतीक है कि उत्तराखंड अपनी संस्कृति, अपने इतिहास और अपने नायकों को कभी नहीं भूलता। उनके पैतृक और ऐतिहासिक स्थल को संवारने से आने वाले पर्यटकों और युवाओं को उनके संघर्षमय जीवन के बारे में जानने का अवसर मिलेगा।

वर्तमान समाज में जयानंद भारती के विचारों की प्रासंगिकता
आज जब हम आधुनिक युग में सांस ले रहे हैं, तब हमें यह आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता है कि क्या हमने उन आदर्शों को पूरी तरह से अपनाया है जिनके लिए जयानंद भारती जैसे महापुरुषों ने अपना पूरा जीवन दांव पर लगा दिया था? आज भी समाज के विभिन्न कोनों में भेदभाव, असमानता और कुरीतियां किसी न किसी रूप में सिर उठाती रहती हैं। ऐसे में कर्मवीर जयानंद भारती के विचार हमारे लिए एक मार्गदर्शक दीये का काम करते हैं।

उनका यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है कि जब तक समाज में हर व्यक्ति को समानता और सम्मान का अधिकार नहीं मिलता, तब तक सच्ची प्रगति संभव नहीं है। युवाओं को उनके जीवन से प्रेरणा लेनी चाहिए और यह समझना चाहिए कि देश और समाज का निर्माण केवल भौतिक विकास से नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों, आपसी भाईचारे और समानता की भावना से होता है। जयानंद भारती का त्याग हमें यह सिखाता है कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और न्याय का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।

उत्तराखंड रत्न कर्मवीर जयानंद भारती का जीवन इस बात का सबसे बड़ा सुबूत है कि एक अकेला व्यक्ति यदि दृढ़ निश्चय कर ले, तो वह पूरी व्यवस्था को हिला सकता है और समाज की दिशा बदल सकता है। उन्होंने अपनी कविताओं, अपने भाषणों और अपने धरातलीय संघर्षों से जो अलख जगाई, वह आज भी उत्तराखंड की हवाओं में महकती है। डोला-पालकी आंदोलन से लेकर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ तिरंगा फहराने तक, उनका हर एक कदम देश और समाज के नाम था। हमें उनके बताए मार्ग पर चलकर एक ऐसे समतामूलक, सशक्त और सुंदर समाज का निर्माण करना चाहिए जहाँ किसी भी व्यक्ति के साथ उसकी जाति या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी उस महान कर्मवीर को, जिन्होंने अपना पूरा जीवन हंसते-हंसते उत्तराखंड की मिट्टी और उसकी जनता के नाम कर दिया।

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