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कुमाऊं मंडल के अधिकारियों को कमिश्नर दीपक रावत की अंतिम चेतावनी: ‘कागजी विकास नहीं चलेगा, धरातल पर दिखाओ काम’

कुमाऊं मंडल के प्रशासनिक केंद्र हल्द्वानी में आयोजित हालिया जनसुनवाई केवल शिकायतों के निस्तारण का एक औपचारिक आयोजन भर नहीं थी, बल्कि यह हमारे मौजूदा सामाजिक, प्रशासनिक और भू-राजस्व ढांचे की गहरी परतों को उजागर करने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है। मुख्यमंत्री के आयुक्त और सचिव दीपक रावत द्वारा कैम्प कार्यालय में आयोजित इस जनसुनवाई ने स्पष्ट कर दिया है कि आम जनता को दैनिक जीवन में किस तरह की जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। भूमि विवादों से लेकर ढांचागत विकास की अड़चनों, विभागों के आपसी तालमेल की कमी और प्रशासनिक लापरवाही तक, इस आयोजन में ऐसे अनेक विषय सामने आए जो सीधे तौर पर आम नागरिक के अधिकारों और जीवन स्तर से जुड़े हैं। जब एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सीधे जनता से संवाद करता है और मौके पर ही त्वरित फैसले लेता है, तो न केवल आम नागरिक का व्यवस्था में विश्वास बहाल होता है, बल्कि यह निचले स्तर के अधिकारियों के लिए भी एक कड़ा संदेश होता है कि काम में ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

भू-माफिया का जाल और क्रेताओं की सतर्कता
उत्तराखंड के मैदानी और अर्ध-पहाड़ी इलाकों में पिछले कुछ दशकों में संपत्ति के दामों में भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही भूमि सौदों में धोखाधड़ी और अनियमितताओं के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। जनसुनवाई में प्राप्त कुल शिकायतों में से अधिकांश का भूमि विवादों से संबंधित होना इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि राज्य में भू-राजस्व और संपत्ति पंजीकरण की व्यवस्था को और अधिक पारदर्शी बनाने की आवश्यकता है।

अक्सर देखा जाता है कि लोग अपनी गाढ़ी कमाई से जीवन भर की बचत जोड़कर एक छोटा सा भूखंड खरीदते हैं। लेकिन उचित जानकारी के अभाव में या धोखाधड़ी का शिकार होकर वे ऐसी उलझनों में फंस जाते हैं, जिनसे निकलने में वर्षों लग जाते हैं। जनसुनवाई के दौरान आयुक्त ने नागरिकों को एक बेहद व्यावहारिक और महत्वपूर्ण सलाह दी। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि भूमि क्रय करने के तुरंत बाद उसकी चहारदीवारी यानी सीमांकन का निर्माण अवश्य करवा लेना चाहिए। यदि संभव हो तो यथाशीघ्र भवन निर्माण का कार्य भी शुरू कर देना चाहिए।

पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों में यह देखा गया है कि लोग जमीन खरीदकर उसे सालों तक यूं ही छोड़ देते हैं। न तो वहां कोई सीमा चिन्ह लगाया जाता है और न ही उसकी नियमित देखरेख की जाती है। इस ढिलाई का फायदा उठाकर कुछ असामाजिक तत्व या बेईमान विक्रेता उसी जमीन को किसी दूसरे व्यक्ति को बेच देते हैं या उसके रकबे में हेरफेर कर देते हैं। जब वास्तविक खरीदार वर्षों बाद अपनी जमीन पर निर्माण कराने पहुंचता है, तो उसे पता चलता है कि उसकी जमीन का वजूद ही कागजों या जमीन पर समाप्त हो चुका है।

धोखाधड़ी पर नकेल और लैंड फ्रॉड कानून का डर
जनसुनवाई में सामने आया ममता मेहरा का मामला हमारे समाज में फैले भू-माफिया के दुस्साहस का एक जीता-जागता उदाहरण है। हल्द्वानी निवासी ममता मेहरा ने वर्ष दो हजार पंद्रह में फतेहपुर चारधाम मंदिर क्षेत्र में लगभग दो हजार वर्ग फुट का एक प्लॉट खरीदा था। उन्होंने उस समय सुरक्षा के दृष्टिकोण से उसकी चहारदीवारी भी बनवाई थी। लेकिन जब वे वर्ष दो हजार चौबीस में उस पर मकान बनाने पहुंचीं, तो उनके पैर तले जमीन खिसक गई। जांच में पता चला कि जिस विक्रेता से उन्होंने जमीन खरीदी थी, उसने पूरी कॉलोनी में बेतहाशा प्लॉटिंग कर सारे भूखंड दूसरों को बेच दिए थे। हद तो तब हो गई जब विक्रेता ने कॉलोनी की मुख्य सड़क तक को बेच डाला और वहां किसी भी खरीदार के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं छोड़ी।

यह मामला केवल एक व्यक्ति के साथ हुई धोखाधड़ी का नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को दर्शाता है जहां अवैध रूप से धन कमाने के लिए नियमों और मानवीय संवेदनाओं को ताक पर रख दिया जाता है। इस मामले में आयुक्त का रुख बेहद कड़ा और अनुकरणीय रहा। उन्होंने विक्रेता को तत्काल तलब किया और दोनों पक्षों की उपस्थिति में तीन दिनों के भीतर पीड़िता को उसका प्लॉट वापस दिलाने का स्पष्ट निर्देश दिया। इसके साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि जांच में यदि धोखाधड़ी की पुष्टि होती है, तो संबंधित भू-स्वामी के खिलाफ भू-धोखाधड़ी अधिनियम के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर कठोर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इस प्रकार के सख्त फैसलों से समाज में एक सकारात्मक संदेश जाता है। जब तक फर्जीवाड़ा करने वालों के मन में कानून का भय नहीं होगा, तब तक आम नागरिकों की मेहनत की कमाई सुरक्षित नहीं रह सकती। प्रशासनिक स्तर पर इस तरह की त्वरित कार्रवाई से उन लोगों के हौसले पस्त होते हैं जो सीधे-साधे लोगों को अपनी ठगी का शिकार बनाते हैं।

विभागों के बीच आपसी सामंजस्य की कमी और विकास कार्य
उत्तराखंड जैसे भौगोलिक दृष्टि से संवेदनशील राज्य में बुनियादी ढांचे का विकास हमेशा से एक चुनौती रहा है। लेकिन कई बार प्राकृतिक चुनौतियों से ज्यादा प्रशासनिक अड़चनें विकास की गति को रोक देती हैं। जनसुनवाई में गौलापार के विजयपुर गांव का मामला इस बात का ज्वलंत उदाहरण है कि कैसे दो सरकारी विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण आम जनता को वर्षों तक मूलभूत सुविधाओं से वंचित रहना पड़ता है।

पूर्व क्षेत्र पंचायत सदस्य और स्थानीय ग्रामीणों ने जनसुनवाई में बताया कि विजयपुर गांव में सूखी नदी पर काजवे के साथ-साथ दो किलोमीटर लंबी सड़क के निर्माण को शासन स्तर से स्वीकृति मिल चुकी थी। लोक निर्माण विभाग ने काम भी शुरू करवा दिया था, लेकिन वन विभाग की आपत्तियों के कारण यह महत्वपूर्ण योजना बीच में ही रुक गई। जब दो सरकारी विभाग आपस में उलझते हैं, तो उसका सीधा खामियाजा वहां की निर्दोष जनता को भुगतना पड़ता है। सड़क न होने से ग्रामीणों को स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा और बाजार तक पहुंचने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा था।
इस मामले में आयुक्त ने दोनों विभागों के जिम्मेदार अधिकारियों को एक साथ तलब कर स्थिति स्पष्ट करने के निर्देश दिए। तकनीकी पेंच यह था कि सड़क निर्माण के एवज में लोक निर्माण विभाग द्वारा वन विभाग को तय धनराशि हस्तांतरित की जानी थी, जो बजटीय प्रक्रियाओं के कारण अटकी हुई थी। आयुक्त ने व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए निर्देश दिया कि धनराशि के भुगतान के लिए शासन को पत्र भेजा जाए, लेकिन जनता की सुविधा को देखते हुए सड़क निर्माण का कार्य तुरंत शुरू किया जाए। उन्होंने वन विभाग को भी निर्देशित किया कि वे इस लोक कल्याणकारी कार्य में कोई अनावश्यक आपत्ति न लगाएं।

यह निर्णय यह सिद्ध करता है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति हो, तो लालफीताशाही की दीवारों को तोड़कर विकास कार्यों को गति दी जा सकती है। सरकारी तंत्र का मुख्य उद्देश्य जनता की सेवा करना है, न कि कागजी उलझनों में विकास को अटकाए रखना।

सड़कों की गुणवत्ता और अधिकारियों की जवाबदेही
किसी भी क्षेत्र के आर्थिक और सामाजिक विकास में सड़कों की भूमिका रीढ़ की हड्डी के समान होती है। खराब और गड्ढे युक्त सड़कें न केवल आवागमन को धीमा करती हैं, बल्कि आए दिन होने वाली दुर्घटनाओं का कारण भी बनती हैं। जनसुनवाई के दौरान हल्द्वानी, अल्मोड़ा, काशीपुर और रामनगर क्षेत्र की सड़कों की स्थिति की भी गहन समीक्षा की गई।

संबंधित विभागों के मुख्य अभियंताओं ने दावा किया कि क्षेत्र की अधिकांश सड़कें लगभग नब्बे प्रतिशत तक गड्ढा मुक्त की जा चुकी हैं। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, नगर निगम और अन्य एजेंसियों ने भी अपने-अपने कार्यों की प्रगति रिपोर्ट पेश की। हालांकि, प्रशासनिक अनुभव यह सिखाता है कि कागजी दावों और जमीनी हकीकत में अक्सर बड़ा अंतर होता है। कागजों पर शत-प्रतिशत काम पूरा दिख सकता है, जबकि धरातल पर यात्री हिचकोले खाने को मजबूर होते हैं।

इस अंतर को समाप्त करने के लिए आयुक्त ने सभी संबंधित उपजिलाधिकारियों को एक बेहद कड़ा निर्देश दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि कोई भी अधिकारी केवल कार्यालय में बैठकर रिपोर्ट तैयार न करे। सभी उपजिलाधिकारी स्वयं धरातल पर जाकर सड़कों का निरीक्षण करें और यह सत्यापित करें कि वास्तव में कार्य हुआ है या नहीं। यदि निरीक्षण के दौरान सड़कें गड्ढा मुक्त नहीं पाई गईं या निर्माण कार्य की गुणवत्ता में कोई कमी मिली, तो इसके लिए किसी ठेकेदार को बलि का बकरा बनाने के बजाय सीधे संबंधित विभागीय अधिकारी को जिम्मेदार माना जाएगा और उनके खिलाफ सख्त दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

जवाबदेही तय करने का यह तरीका प्रशासनिक कार्यशैली में सुधार लाने के लिए बेहद आवश्यक है। जब तक शीर्ष अधिकारियों को यह अहसास नहीं होगा कि उनकी लापरवाही का असर सीधे उनके करियर पर पड़ सकता है, तब तक काम में गुणवत्ता और गति लाना असंभव है।

नागरिक सुविधाओं का त्वरित निस्तारण
जनसुनवाई की सबसे बड़ी खूबसूरती यह होती है कि यहां केवल बड़े नीतिगत मुद्दे ही नहीं, बल्कि आम आदमी के छोटे-छोटे दैनिक संकट भी सुने जाते हैं। एक आम नागरिक के लिए जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र में नाम की गलती सुधरवाना या अपनी बस का स्थायी परमिट बनवाना किसी पहाड़ चढ़ने से कम नहीं होता। आम तौर पर इन छोटे कामों के लिए लोगों को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

इस जनसुनवाई में रोहित पांडे नामक व्यक्ति ने अपने जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र में लिपिकीय त्रुटि के संशोधन का गुहार लगाई। वहीं जगदंबा कॉलोनी के निवासियों ने क्षेत्र में वोल्टेज की समस्या को दूर करने के लिए नया विद्युत ट्रांसफार्मर लगाने की मांग रखी। इसके अतिरिक्त राजेंद्र प्रसाद लखचौरा ने बस का स्थायी परमिट जारी करने का अनुरोध किया।

इन सभी मामलों में आयुक्त ने लालफीताशाही को हावी नहीं होने दिया। उन्होंने क्षेत्रीय परिवहन अधिकारी को तुरंत जांच कर नियमानुसार स्थायी परमिट जारी करने के निर्देश दिए और बिजली व अन्य विभागों को जनहित के कार्यों को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करने को कहा। अधिकांश मामलों का समाधान मौके पर ही दोनों पक्षों की आपसी सहमति से करा दिया गया, जिससे नागरिकों का समय और धन दोनों बचा।

हल्द्वानी में आयोजित यह जनसुनवाई इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि यदि प्रशासनिक नेतृत्व संवेदनशील, पारदर्शी और सख्त हो, तो आम जनता की समस्याओं का त्वरित समाधान संभव है। भूमि क्रय के संदर्भ में दी गई चेतावनियां और सुझाव हर नागरिक के लिए आंखें खोलने वाले हैं। अपनी संपत्ति की सुरक्षा करना स्वयं नागरिक का भी दायित्व है, लेकिन बेईमानों पर नकेल कसना शासन का कर्तव्य है।

इसके साथ ही, विकास कार्यों में विभागों के बीच समन्वय स्थापित करना और सड़कों की गुणवत्ता जांचने के लिए अधिकारियों की सीधी जवाबदेही तय करना एक ऐसा प्रशासनिक मॉडल है जिसे पूरे राज्य में लागू किया जाना चाहिए। जब शासन सीधे जनता के द्वार पर पहुंचता है और मौके पर ही न्याय करता है, तो लोकतंत्र की जड़ें और अधिक मजबूत होती हैं। यह जनसुनवाई केवल शिकायतों के निस्तारण का मंच नहीं थी, बल्कि यह कुशल सुशासन का एक जीवंत उदाहरण बनकर सामने आई है।

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