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आज भी जारी है ले. जन. गुरमीत सिंह का सेवा-संकल्प: पूर्व राज्यपाल का जीवन दर्शाता है कि सच्चे कर्मठ इंसान के लिए राष्ट्र सेवा ही सर्वोपरि है

आज के इस दौर में जब पूरी दुनिया भौतिकता की अंधी दौड़ में शामिल है और हर तरफ तनाव, अविश्वास और आपसी टकराव का माहौल देखने को मिलता है, तब शांति, करुणा और भाईचारे की बात करना किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है। हाल ही में गुरुग्राम के प्रतिष्ठित विश्व शांति केंद्र में एक बेहद खास और ऐतिहासिक आयोजन संपन्न हुआ। यह आयोजन इंसानियत, रूहानी सुकून और वैश्विक शांति के उस संकल्प का उत्सव था जिसे अहिंसा विश्व भारती संस्था ने पिछले दो दशकों में सींचा है। इस संस्थान के स्थापना के गौरवशाली बीस वर्ष पूरे होने पर आयोजित समारोह के दौरान ‘शांति–सद्भावना वर्ष’ का औपचारिक शुभारंभ किया गया।

इस अवसर पर पूर्व राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह की गरिमामयी मौजूदगी और उनका मार्गदर्शन विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। उन्होंने अपने संदेश में इस बात पर जोर दिया कि नैतिक मूल्यों, राष्ट्र सेवा और आध्यात्मिक चेतना के माध्यम से ही समाज में स्थायी शांति कायम की जा सकती है। पूर्व राज्यपाल जी के दूरदर्शी विचारों और प्रेरणादायी संबोधन ने इस आयोजन को और अधिक प्रासंगिक बना दिया।

समारोह का मुख्य उद्देश्य इंसानों के दिलों से नफरत की दीवारें गिराकर प्रेम और विश्वास के बीज बोना था। इस मौके पर पूर्व राज्यपाल जी और अन्य अतिथियों द्वारा समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए समर्पित व्यक्तित्वों को सम्मानित भी किया गया। लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह जी जैसे समर्पित मार्गदर्शकों की उपस्थिति ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि यदि समाज को सही दिशा देने वाले नेतृत्व का साथ मिले, तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी उम्मीद की किरण जलाई जा सकती है। अहिंसा विश्व भारती का यह दो दशकों का सफर और इसमें पूर्व राज्यपाल जी का जुड़ाव इस बात का जीता-जागता प्रमाण है कि नेक नीयत और सच्चे समर्पण से समाज की सूरत और तकदीर दोनों बदली जा सकती है।

अहिंसा विश्व भारती के दो दशकों का स्वर्णिम सफर और उपलब्धियां

किसी भी संगठन के लिए दो दशक का सफर तय करना और अपने मूल उद्देश्यों पर अडिग रहना एक बहुत बड़ी चुनौती होता है। आज से ठीक बीस साल पहले जब इस संस्था की नींव रखी गई थी, तब इसका उद्देश्य केवल कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका विस्तार पूरी मानवता के कल्याण के लिए था। इन बीस वर्षों के दौरान संस्था ने देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में शांति और अहिंसा का जो अलख जगाया है, वह इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज होने योग्य है। संस्था की इस लंबी यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन इसके समर्पित नेतृत्व ने कभी भी अपने मार्ग से भटकाव नहीं होने दिया।

शुरुआती दौर से ही इस मंच ने समाज के दबे-कुचले और पिछड़ों की आवाज बनने के साथ-साथ वैचारिक और धार्मिक मतभेदों को पाटने का काम किया है। अलग-अलग संस्कृतियों और धर्मों के बीच संवाद स्थापित करके इसने यह साबित कर दिया कि इंसानियत सभी धर्मों से ऊपर है। इन बीस वर्षों में संस्था ने न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी एक खास पहचान बनाई है। दुनिया के कई देशों में जाकर वहां के प्रमुख विचारकों, नीति निर्माताओं और आम नागरिकों को शांति और अहिंसा के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया गया है। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो पाते हैं कि इन दो दशकों की मेहनत रंग लाई है और आज दुनिया भर में लाखों लोग इस वैचारिक आंदोलन से जुड़ चुके हैं।

आचार्य लोकेश मुनि जी का विजन और वैचारिक मार्गदर्शन

किसी भी संस्था की सफलता के पीछे उसके मुख्य संचालक या मार्गदर्शक का विजन सबसे महत्वपूर्ण होता है। अहिंसा विश्व भारती की इस शानदार यात्रा के केंद्र में पूज्य जैन आचार्य श्री लोकेश मुनि जी का ओजस्वी और प्रेरणादायक मार्गदर्शन रहा है। आचार्य जी ने हमेशा से इस बात पर जोर दिया है कि शांति केवल भाषणों से नहीं आती, बल्कि इसके लिए आचरण और व्यवहार में बदलाव लाना जरूरी है। उनका पूरा जीवन मानवता की सेवा, प्राणी मात्र के प्रति करुणा और समाज को एक नई दिशा देने के लिए समर्पित रहा है।

आचार्य श्री लोकेश मुनि जी के नेतृत्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे प्राचीन भारतीय दर्शन और आधुनिक समय की समस्याओं के बीच एक बेहतरीन संतुलन बिठाते हैं। उन्होंने भगवान महावीर के संदेशों को केवल धार्मिक पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें आम जनजीवन की भाषा में ढाला ताकि हर व्यक्ति आसानी से उन्हें समझ सके और अपने जीवन में उतार सके। उनके प्रयासों के कारण ही आज गुरुग्राम में विश्व शांति केंद्र जैसी विशाल संस्था खड़ी हो पाई है, जो पूरी दुनिया के लिए शांति का एक बहुत बड़ा तीर्थ स्थल बन चुका है। उनके मार्गदर्शन में संस्था ने न केवल वैचारिक बहसों को बढ़ावा दिया है, बल्कि जमीन पर उतरकर जरूरतमंदों की मदद करने और समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ आवाज उठाने का सराहनीय कार्य भी किया है।

भगवान महावीर के प्राचीन सिद्धांतों की आधुनिक समय में प्रासंगिकता

आज की इक्कीसवीं सदी में जब दुनिया तकनीकी रूप से बहुत आगे निकल चुकी है, तब हमारे सामने सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि क्या हमारी नैतिकता भी उसी रफ्तार से विकसित हुई है? इस सवाल का जवाब पाने के लिए हमें प्राचीन भारतीय दर्शन, विशेषकर भगवान महावीर के सिद्धांतों की ओर लौटना होगा। भगवान महावीर द्वारा बताए गए तीन प्रमुख स्तंभ  अहिंसा, अनेकांतवाद और अपरिग्रह, आज के समय में और भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं।

अहिंसा का अर्थ केवल किसी जीव को शारीरिक रूप से नुकसान न पहुंचाना नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी को भी ठेस न पहुंचाना है। आज के तनावपूर्ण दौर में जब बात-बात पर विवाद और हिंसा की घटनाएं सामने आती हैं, तब अहिंसा का यह संदेश हमें संयम रखना सिखाता है। इसी तरह, अनेकांतवाद का सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि हर मुद्दे को देखने के कई दृष्टिकोण हो सकते हैं। हमें दूसरों के विचारों का सम्मान करना चाहिए और अपनी बात को दूसरों पर जबरदस्ती थोपने से बचना चाहिए। इसके अलावा, अपरिग्रह यानी आवश्यकता से अधिक संग्रह न करने की प्रवृत्ति, आज के उपभोक्तावादी समाज में पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक संतुलन के लिए बेहद जरूरी है। जब तक हम इन सिद्धांतों को अपने दैनिक जीवन में नहीं अपनाएंगे, तब तक समाज में स्थाई शांति की कल्पना करना बेमानी होगा।

तकनीकी प्रगति और मानवीय मूल्यों का सुंदर संगम

वर्तमान युग तकनीकी का युग है, और विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने हमारे जीवन के हर क्षेत्र में अपनी गहरी पैठ बना ली है। आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के माध्यम से असंभव लगने वाले काम चुटकियों में हो रहे हैं, चिकित्सा से लेकर अंतरिक्ष विज्ञान तक हर जगह क्रांति आ चुकी है। लेकिन इस तकनीकी क्रांति के साथ एक बहुत बड़ा खतरा भी पैदा हो गया है, और वह है इंसानी संवेदनाओं का कम होना और मशीनीकरण का बढ़ता प्रभाव।

यदि तकनीक पर मानवीय मूल्यों और नैतिकता का नियंत्रण न रहे, तो यह वरदान की बजाय मानवता के लिए अभिशाप बन सकती है। इसलिए यह बेहद जरूरी हो गया है कि हम तकनीकी प्रगति को करुणा, नैतिकता और मानव कल्याण के साथ जोड़कर चलें। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का उपयोग मानवता की भलाई, बीमारियों के इलाज, शिक्षा के प्रसार और गरीबी को मिटाने के लिए होना चाहिए, न कि लोगों के बीच दूरियां बढ़ाने या युद्ध के नए साधन विकसित करने के लिए। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक इंसानों के लिए बनी है, न कि इंसान तकनीक के गुलाम बनने के लिए। जब हम तकनीकी विकास के साथ मानवीय संवेदनाओं का सही तालमेल बिठाएंगे, तभी एक सच्चे और सुंदर भविष्य का निर्माण हो पाएगा।

संवाद, करुणा और सद्भावना से ही संभव है स्थाई शांति

दुनिया भर में आए दिन होने वाले संघर्ष, युद्ध और आपसी मतभेद इस बात का सबूत हैं कि ताकत के बल पर कभी भी स्थाई शांति स्थापित नहीं की जा सकती। इतिहास गवाह है कि तलवार या हथियारों के दम पर कुछ समय के लिए डर का माहौल तो बनाया जा सकता है, लेकिन दिलों को नहीं जीता जा सकता। दिलों को जीतने का एकमात्र रास्ता संवाद, करुणा और सद्भावना ही है।

जब दो पक्षों के बीच विवाद होता है, तो अक्सर लोग अपनी बात मनवाने के लिए आक्रामक हो जाते हैं, जिससे स्थिति और अधिक बिगड़ जाती है। इसके विपरीत, यदि बैठकर शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत की जाए, एक-दूसरे की मजबूरियों और भावनाओं को समझा जाए, तो बड़े से बड़े विवाद का हल भी बहुत आसानी से निकल सकता है। करुणा वह भावना है जो हमें अपनों के साथ-साथ गैरों के प्रति भी संवेदनशील बनाती है। जब समाज में करुणा का भाव जागृत होता है, तब अपराध और नफरत अपने आप कम होने लगते हैं। इसलिए हमें अपने भीतर के अहंकार को छोड़कर संवाद का मार्ग चुनना होगा और हर इंसान के प्रति सद्भावना रखनी होगी।

शांति कोई कोरा आदर्श नहीं, हमारी साझा जिम्मेदारी

अक्सर लोग ऐसा सोचते हैं कि शांति स्थापना का काम केवल सरकारों, बड़े नेताओं या धार्मिक गुरुओं का है, और इसमें आम नागरिक की कोई भूमिका नहीं है। लेकिन यह सोच बिल्कुल गलत है। शांति कोई केवल किताबों में पढ़ने या भाषणों में सुनने की चीज नहीं है, बल्कि यह हम सबकी साझा जिम्मेदारी है। जब समाज का हर व्यक्ति अपने स्तर पर शांति और सद्भाव बनाए रखने का संकल्प लेता है, तभी एक बड़ा बदलाव आता है।

शुरुआत हमेशा घर और परिवार से होती है। यदि हम अपने घर में, अपने पड़ोस में और अपने कार्यस्थल पर प्यार, सम्मान और सहयोग का माहौल बनाएंगे, तो धीरे-धीरे यह पूरा समाज और देश शांति के रंग में रंग जाएगा। हमें यह समझना होगा कि यदि दुनिया में कहीं भी अशांति फैलती है, तो उसका अप्रत्यक्ष असर हम सभी पर पड़ता है। इसलिए यह हमारा नैतिक कर्तव्य है कि हम न केवल खुद शांति से रहें, बल्कि दूसरों को भी शांति से जीने दें और जहां कहीं भी नफरत या भेदभाव की दीवारें उठती दिखें, उन्हें गिराने का प्रयास करें।

अहिंसा विश्व भारती के दो दशकों का यह सफर इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि यदि इरादे नेक हों और रास्ता सच्चाई का हो, तो सफलता जरूर मिलती है। गुरुग्राम के विश्व शांति केंद्र में आयोजित यह समारोह सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह पूरी मानवता के नाम एक संदेश था कि हम सबको मिलकर एक बेहतर दुनिया का निर्माण करना है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम भगवान महावीर के विचारों को अपने जीवन का आधार बनाएं, तकनीक का उपयोग मानवता की भलाई के लिए करें और आपसी मतभेदों को भुलाकर संवाद का रास्ता अपनाएं। शांति केवल एक सपना नहीं है, बल्कि यह हमारे आज के प्रयासों से कल की सबसे बड़ी हकीकत बन सकती है। आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन में करुणा, सद्भावना और अहिंसा के मार्ग पर चलेंगे और इस धरती को रहने के लिए एक और भी अधिक सुंदर और शांतिपूर्ण स्थान बनाएंगे।

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