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Shine AVI Learning की संस्थापक अनीता ने अमेरिका से उत्तराखंड आकर अनीता ने बदली विशेष बच्चों की तकदीर – Shine AVI Learning की अनूठी पहल, मुख्यमंत्री धामी के समर्थन से बच्चों की अदृश्य शैक्षणिक चुनौतियों को करेंगी दूर

Shine AVI Learning आज देश के शिक्षा जगत और बाल विकास के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी आंदोलन का रूप ले चुका है। विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के भीतर छिपी हुई अद्भुत क्षमताओं को पहचानने और उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के पुनीत संकल्प के साथ एक विशेष पुस्तक का विमोचन किया गया है। इस अत्यंत संवेदनशील और अभूतपूर्व परियोजना को यह ऐतिहासिक मुकाम दिलाने का पूरा श्रेय संस्था की दूरदर्शी संस्थापक अनीता को जाता है, जिन्होंने इस मानवीय कार्य को धरातल पर उतारने के लिए अमेरिका जैसे विकसित देश की सुख-सुविधाओं और ऐशो-आराम को त्याग दिया। देवभूमि उत्तराखंड की पावन धरती से अपनी इस अद्भुत और प्रेरणादायी यात्रा की शुरुआत करने वाली अनीता जी ने आज उन लाखों बच्चों के जीवन में उम्मीद का एक नया सवेरा ला दिया है, जो सामान्य विद्यालयों में पढ़ते हुए भी कुछ अदृश्य चुनौतियों और सीखने के अंतर का सामना करते हैं।

इस ऐतिहासिक लोकार्पण समारोह को न केवल स्थानीय समाज बल्कि उत्तराखंड सरकार का भी भरपूर और आधिकारिक प्रोत्साहन मिला है। सूबे के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश के संपूर्ण शिक्षा विभाग ने अनीता की इस अनूठी मानवीय पहल की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए इसे अपना पूर्ण संगठनात्मक समर्थन प्रदान किया है। अनीता का यह कदम उन बच्चों के लिए एक वरदान सिद्ध हो रहा है जो शारीरिक या मानसिक रूप से पूर्णतः अक्षम की श्रेणी में तो नहीं आते, लेकिन अपनी विशिष्ट मानसिक बनावट के कारण सामान्य बच्चों की सीखने की गति से पीछे छूट जाते हैं

संस्थापक अनीता का पैतीस वर्षों का गहन संघर्ष और अमेरिका से भारत वापसी की दास्तां
Shine AVI Learning की इस अभूतपूर्व सफलता के पीछे कोई व्यावसायिक रणनीति नहीं, बल्कि संस्थापक अनीता जी के जीवन का पैतीस वर्षों का लंबा व्यक्तिगत संघर्ष और एक मां की अटूट ममता निहित है। अनीता स्वयं दो विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की माता हैं और उन्होंने इस दर्द, सामाजिक उपेक्षा तथा व्यवस्था की कमियों को बहुत करीब से अनुभव किया है। उनके एक बच्चे की मानसिक और व्यावहारिक आवश्यकताएं अत्यंत जटिल हैं, जबकि उनका दूसरा बच्चा असाधारण रूप से उच्च बौद्धिक क्षमता का धनी है। जब उन्होंने समाज में ऑटिज़्म जैसी जटिल मानसिक स्थितियों से जूझ रहे बच्चों की स्थिति को देखा, तो उन्होंने महसूस किया कि यह एक ऐसी स्थिति है जो जीवन में कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होती, बल्कि सही मार्गदर्शन और विशिष्ट शिक्षण विधियों के माध्यम से इसे एक सकारात्मक दिशा दी जा सकती है।

पिछले पंद्रह वर्षों से इस क्षेत्र में व्यावसायिक रूप से विशेष पाठ्यक्रम तैयार करने का कार्य कर रही अनीता लंबे समय तक अमेरिका में रहीं। वहां उनके पास संसाधनों और आधुनिक तकनीकों की कोई कमी नहीं थी। वे चाहतीं तो इस परियोजना को अमेरिका में ही बहुत बड़े स्तर पर संचालित कर सकती थीं, लेकिन उनके भीतर अपनी मातृभूमि और देवभूमि उत्तराखंड के प्रति एक गहरा लगाव था। उन्होंने संकल्प लिया कि वे अपनी इस विशेषज्ञता और जीवनभर के शोध का लाभ सबसे पहले अपने देश के बच्चों को देंगी। इसी पावन उद्देश्य के साथ वे अमेरिका से भारत वापस आईं और उन्होंने उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य को अपनी कर्मभूमि चुना, जहाँ इस प्रकार की अत्याधुनिक शैक्षिक सुविधाओं का अत्यंत अभाव था।

रेगुलर स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों की अदृश्य और छिपी हुई जरूरतों का वैज्ञानिक विश्लेषण
अनीता ने अपने गहन शोध और व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर देश की वर्तमान शिक्षा प्रणाली में व्याप्त एक बहुत बड़े अंतर को उजागर किया है। उन्होंने बताया कि समाज आमतौर पर केवल उन्हीं बच्चों को विशेष आवश्यकता वाला मानता है जो पूरी तरह से अक्षम होते हैं। लेकिन वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न है। आज प्रत्येक विद्यालय की सामान्य कक्षा में अगर चालीस बच्चे पढ़ रहे हैं, तो उनमें से कम से कम दस बच्चे ऐसे होते हैं जो रेगुलर स्कूल जाने के बावजूद सामान्य बच्चों की गति से विषयों को समझ नहीं पाते। इन बच्चों की मानसिक और शैक्षणिक चुनौतियां समाज और शिक्षकों की नजरों से पूरी तरह अदृश्य रह जाती हैं।

ऐसे बच्चों में मुख्य रूप से भाषा संबंधी विकार, संवाद स्थापित करने में कठिनाई, सीखने की धीमी गति, शारीरिक या मानसिक विकास में देरी और प्राप्त सूचनाओं को संसाधित करने की धीमी क्षमता जैसी चुनौतियां पाई जाती हैं। अनीता ने स्पष्ट किया कि पूर्णतः अक्षम या ऑटिज़्म से गंभीर रूप से प्रभावित बच्चों के लिए उनका मायरा केयर सेंटर पहले से ही बहुत मुस्तैदी से काम कर रहा है। परंतु, यह नई पुस्तक और शिक्षण पद्धति विशेष रूप से उन बच्चों के लिए एक संजीवनी बूटी की तरह तैयार की गई है जो सामान्य स्कूलों की कक्षाओं में बैठकर भी हर दिन एक अदृश्य मानसिक तनाव और पिछड़ेपन से जूझते हैं। इस पुस्तक में ऐसे व्यावहारिक और वैज्ञानिक तौर-तरीकों का समावेश किया गया है, जिसकी मदद से शिक्षक और माता-पिता इन बच्चों के सीखने के अंतराल को आसानी से पहचान कर उसे दूर कर सकते हैं।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और प्रदेश के शिक्षा विभाग का मिला ऐतिहासिक सहयोग
अनीता के इस महान सामाजिक और शैक्षणिक अभियान को उत्तराखंड की धरती पर स्थापित करने में राज्य सरकार और नौकरशाही ने बहुत ही संवेदनशील और सुगम भूमिका निभाई है। अनीता ने सरकार के प्रति अपनी गहरी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि देवभूमि का प्रशासनिक तंत्र जनहित के कार्यों के लिए बेहद सुलभ और पारदर्शी है। प्रदेश के शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने व्यक्तिगत रूप से इस विषय की गंभीरता को समझा और अनीता जी के इस प्रयास को पूरे राज्य में लागू करने के लिए शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों को निर्देशित किया। इसके बाद प्रदेश के शिक्षा सचिव और शिक्षा निदेशक सहित विभाग के तमाम शीर्ष नेतृत्व ने अनीता जी का खुले दिल से स्वागत किया और इस क्रांतिकारी पाठ्यक्रम को धरातल पर उतारने के लिए हर संभव सहयोग का आश्वासन दिया।

लोकार्पण कार्यक्रम में उपस्थित शिक्षा विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों ने माना कि अनीता जी द्वारा तैयार किया गया यह अनूठा पाठ्यक्रम सरकारी और निजी दोनों प्रकार के विद्यालयों में समावेशी शिक्षा के संकल्प को मजबूत करने में एक मील का पत्थर साबित होगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कुशल नेतृत्व में राज्य सरकार इस बात के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है कि उत्तराखंड के प्रत्येक बच्चे को, चाहे उसकी मानसिक या शारीरिक स्थिति कैसी भी हो, विकास के समान अवसर और एक बेहद अनुकूल शैक्षिक वातावरण मिलना ही चाहिए।

दया भाव के बजाय बच्चों की क्षमता वर्धन और शिक्षण शैली में बदलाव पर जोर
भारत में आमतौर पर विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के प्रति समाज का नजरिया केवल एक खोखली सहानुभूति या चिकित्सा उपचार तक ही सीमित रहता है। लेकिन अनीता  ने इस पारंपरिक और रूढ़िवादी सोच को पूरी तरह से बदलने का बीड़ा उठाया है। उनका मानना है कि इन बच्चों को किसी दया या करुणा की भावना से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उनके सीखने के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए हमें अपनी पूरी शिक्षा प्रणाली और पढ़ाने के तौर-तरीकों में एक बड़ा बदलाव करना होगा। शिक्षा का वास्तविक अर्थ केवल उच्च शैक्षणिक डिग्रियां या पीएचडी हासिल करना नहीं है, बल्कि प्रत्येक बच्चे को उसकी प्राकृतिक और व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार सीखने और आगे बढ़ने का पूरा अवसर प्रदान करना है।

अनीता का मूल सिद्धांत इस विचार पर आधारित है कि यदि कोई बच्चा उस तरीके से नहीं सीख पा रहा है जिस तरीके से शिक्षक उसे पढ़ा रहे हैं, तो यह उस बच्चे की विफलता नहीं है, बल्कि यह हमारी शिक्षण पद्धति की कमी है। ऐसी स्थिति में हमें अपने पढ़ाने के तरीके को बदलकर उस स्तर पर ले जाना होगा जिस स्तर से वह बच्चा आसानी से और बिना किसी मानसिक दबाव के विषयों को आत्मसात कर सके। यही आधुनिक, वैज्ञानिक और संवेदनशील दृष्टिकोण अनीता जी की इस कार्यप्रणाली को देश की अन्य सभी शिक्षण पद्धतियों से बिल्कुल अलग और सर्वोत्कृष्ट बनाता है।

उत्तराखंड से शुरू हुआ कारवां, अब देश के विभिन्न हिस्सों में स्थापित होंगे पचास केंद्र
इस महान सामाजिक और शैक्षणिक महाअभियान को धरातल पर एक मजबूत व्यावसायिक और तकनीकी रूप देने के लिए अनीता ने देश के सुप्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉक्टर निशांत नवानी के साथ एक बेहद मजबूत सहयोग स्थापित किया है, जो इस परियोजना के सह-संस्थापक भी हैं। डॉक्टर नवानी ने अनीता की विशेषज्ञता और उनके जीवनभर के व्यावहारिक अनुभवों को जोड़कर इस पूरे कार्यक्रम को एक वैज्ञानिक और वैश्विक ढांचा प्रदान किया है। इस अभियान की शुरुआत सबसे पहले उत्तराखंड की पावन धरती से की गई है, जहाँ पहला अत्याधुनिक केंद्र सफलतापूर्वक संचालित हो रहा है। अनीता की भविष्य की योजनाओं में देश के विभिन्न राज्यों में ऐसे पचास नए अत्याधुनिक केंद्र खोलने का लक्ष्य शामिल है, जिसके तहत चंडीगढ़, सहारनपुर और नोएडा में तीन नए केंद्रों की स्थापना की रूपरेखा पूरी तरह से तैयार कर ली गई है।

यह पूरी संस्था एक गैर-लाभकारी कंपनी के रूप में पंजीकृत है, जिसे विधिक रूप से आयकर अधिनियम की धारा 12A और 80G के अंतर्गत पूर्ण मान्यता प्राप्त है। इस पुनीत कार्य में सूर्या हॉस्पिटल के डॉक्टर शिवानंद उनियाल, नताशा शर्मा और उत्तराखंड क्रांति दल के वरिष्ठ नेता शिवानंद चमोली सहित चार प्रमुख भागीदार अनीता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। संस्था का मुख्य उद्देश्य भविष्य में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व यानी CSR फंड के माध्यम से इस सेवा का और अधिक विस्तार करना है ताकि ग्रामीण और निर्धन परिवारों के बच्चों को भी यह विश्वस्तरीय सुविधा पूरी तरह से निःशुल्क मिल सके। वर्तमान में बच्चों से बेहद न्यूनतम शुल्क लेकर इस पूरी व्यवस्था को संचालित किया जा रहा है। अनीता जी के इस दृढ़ संकल्प और उनके अमेरिका से भारत वापसी के फैसले ने निश्चित रूप से देश में समावेशी शिक्षा के क्षेत्र में एक नए और स्वर्णिम युग की शुरुआत कर दी है ।

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